अर्थशास्त्र में राजपद की अवधारणा
राजपद-अर्थशास्त्र में राजपथ एवं राजा के संबंध में विस्तार से विचार किया गया है I अध्ययन सुविधा की दृष्टि से इस संपूर्ण विवरण को निम्न भागों में बांट सकते हैं-
१-राजा के व्यक्तिगत गुण एवं योग्यता-अर्थशास्त्र की राजव्यवस्था में राजा का केंद्रीय स्थान है १ I अतः कौटिल्य द्वारा राजा के गुणों पर विस्तार से विचार किया गया है I अर्थशास्त्र के अनुसार अग्रलिखित गुण राजा को राज्य पद के योग्य बनाते हैं -अभिगामित प्रज्ञा गुण, उत्साह गुण, एवं आत्मा संपन्न गुण २ I कौटिल्य ने मुख्तया धर्म ,अर्थ ,काम ,प्रजाजन की मान्यता, तथा राजनीतिक आवश्यकताओं के प्रसंग में राजा के उपरोक्त चारों गुणों की व्याख्या की है-
१-राजा में ऐसे सभी गुण होने चाहिए जो प्रजाजन में उसकी आभा और प्रभाव स्थापित करने में मदद दे I राजा को उच्च कुलीन, प्रसन्नचित्त ,मृदभाषी ,प्रजाकल्याण ,तथा प्रजा के सम्मान में रुचि रखकर प्रजाजन में अपनी लोकप्रियता बनाए रखने के गुण से संपन्न होने चाहिए I
२-राजा में ऐसे नैतिक सद्गुण होने चाहिए जो शासन के रूप में उसकी मानसिक क्षमता को बढ़ाने वाले हो I उसे इंद्रियजय वृद्ध जनों की बातों से ज्ञान प्राप्त करने वाला, विद्या अनुरागी ,स्मृति वन ,उच्च अभिलाषी, एवं उत्साही, मर्यादाशील, अन्यों के धन व स्त्री का त्याग, अक्रूर ,तथा धर्म ,अर्थ ,काम ,का संतुलन ,भोग करने वाला ,होना चाहिए I
३-उसे शासन की कला से संबंधित सभी गुणों से संपन्न होना चाहिए I उसे दृढ़ बुद्धि वाला ,सुयोग परिषद वाला ,शक्ति संपन्न ,शौर्यवान, राज्य की विभिन्न प्रवृत्तियों की विपदाओं का प्रतिकार करने में समर्थ ,सामंतों को नियंत्रण में रखने में समर्थ ,संकट काल में अन्न धन को सेना का उचित प्रयोग करने वाला ,शत्रु की कमजोरी एवं आपदाओं का लाभ उठाने वाला ,विचारशील व दूरदर्शी कार्य के परिणाम का सही अनुमान लगाने वाला ,देश काल के अनुसार निर्णय लेने वाला, तथा पुरुषार्थ करने वाला ,होना चाहिए I
युवराज की शिक्षा-राजतंत्र के सफल संचालन की दृष्टि से शिक्षा के महत्व को बताते हुए कौटिल्य ने कहा है जिस प्रकार घून लगी हुई लकड़ी शीघ्र नष्ट हो जाती है उसी प्रकार जिस राजवंश के राजपुत्र शिक्षित नहीं किए जाते हैं I वह राजवंश युद्ध आदि के अभाव में स्वयं नष्ट हो जाते हैं ३ I पुनः इसी संबंध में कौटिल्य का कथन है कि सुशिक्षा से शिक्षित राजा समस्त प्राणियों के हितों में लगा हुआ और प्रजा के आरक्षण में तत्पर हुआ चिरकाल तक पृथ्वी का निष्कंटक भोग करता है ४ I कौटिल्य के अनुसार उपनयन संस्कार के बाद राजकुमारों को विभिन्न आचार्य से त्रयी ,आण्विक्षिकी, वार्ता ,एवं दंड नीति की शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए ५ I राजकुमार विद्यार्थी जीवन में भली भांति शिक्षा ग्रहण कर इस इस उद्देश्य से कौटिल्य ने उनकी दिनचर्या को तीन भागों में बाटॉ है I इस दिनचर्या से उपरोक्त विधाओं के अलावा इतिहास व सैन्य शिक्षा को भी पर्याप्त स्थान दिया गया हैI कौटिल्य का मत है कि विवाह होने के बाद भी राजकुमारों को अपने शास्त्र ज्ञान की वृद्धि के लिए सदैव विद्यान पुरुषों की संगति करनी चाहिए I कौटिल्य की शिक्षा व्यवस्था तत्कालीन परिस्थितियों में राजकुमारों के लिए पर्याप्त उपयोगी दिख पड़ती है I उन्होंने पाठ्यक्रम में सैद्धांतिक व व्यावहारिक शिक्षा दोनों में उचित तालमेल स्थापित किया है I
राजा की दिनचर्या-कौटिल्य ने राजा की ऐसी दिनचर्या प्रस्तुत की है जिसका पालन करते हुए वह राज्य के समस्त प्रमुख कार्यों का उचित रूप में संचालन वह नियंत्रण करने में समर्थ हो सकता हैI उन्होंने दिन व रात्रि के संपूर्ण काल को 16 भागों में बनता है I और पुनः दिन के आठ भागों तथा रात्रि के आठ भागों की अलग-अलग कार्य सूचियाँ दी हैं ६ I कौटिल्य ने काल के उपरोक्त प्रत्येक भाग को नलिका कहा है I प्रत्येक नलिका आधुनिक दृष्टि से डेढ़ घंटे के बराबर होती है ७ I
कौटिल्य द्वारा प्रस्तुत राजा के दिनचर्या से यह स्पष्ट है कि राजा को सोने के लिए मात्र दो नलिकाओं यानी 3 घंटे का समय प्राप्त है और उसे व्यक्तिगत कार्यों के लिए बहुत कम समय ही उपलब्ध है I उसका संपूर्ण जीवन राज कार्यों के लिए समर्पित है I इस प्रकार उसके लिए शासन कार्य सत्ता भोग का उतना विषय नहीं है जितना की कर्तव्य पालन का शासक के गुण एवं उसके दिनचर्या I इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि कौटिल्य ने राजा की कल्पना एक राजर्षि के रूप में की हैI यह उल्लेखनीय है कि कौटिल्य ने उपरोक्त दिनचर्या को राजा पर आहार से बंधानकारी नहीं माना है I अपितु उनके मत है कि राजा परिस्थितियों एवं अपनी क्षमता के अनुसार इस दिनचर्या में व्यावहारिक परिवर्तन कर सकता है ८ Iकिंतु उसे अपने कार्यों को स्वयं ही करना चाहिए अर्थात प्रमादवश अपने कार्य अन्य को नहीं सौंपने चाहिए इसके अलावा उन्होंने अमात्यों का यह दायित्व बताया है कि वह विलास के लिए ललायित राजा को दिनचर्या के अनुसार कार्य करने के लिए प्रेरित करें ९ I
राजा के कार्य एवं शक्तियां-कौटिल्य ने एक अति शक्तिशाली विस्तृत एवं केंद्रीकृत राजतंत्र की व्यवस्था को स्वीकार है और इसके अनुरूपी राजा के विस्तृत कार्यों व शक्तियों का उल्लेख किया है I इसके कार्य व शक्तियां निम्न है-
१-राज्य में शांति व व्यवस्था बनाए रखना
२-समाज व्यवस्था की रक्षा करना १०
३-राज्य के सप्तांग सिद्धांत की रक्षा करना
४-राज्य की वाह्य आक्रमण से रक्षा करना तथा राज्य की सीमाओं का विस्तार करना
५-शासन के विभिन्न पदों पर नियुक्तियां करना ११
६- राजाज्ञा संबंधी कार्य करना
७-न्याय संबंधी कार्य करना
८-राज्य की समृद्धि हेतु विभिन्न आर्थिक कार्य करना १२
९-प्रजा कल्याणकारी कार्य करना १३
निष्कर्ष-उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि राजा के कर्तव्यों कार्यों व शक्तियों का क्षेत्र बहुत व्यापक है I राजा के संपूर्ण कार्यों एवं उसे प्राप्त शक्तियों का एकमात्र लक्ष्य है प्रजा हित I इस दृष्टिकोण से राजा अनेकानेक प्रजा कल्याणकारी कार्यों को करता है और वह स्वामी होकर भी प्रजा सेवक के दायित्व को निभाते हैं I एक अति शक्तिशाली एवं विस्तृत राजतंत्र व्यवस्था में राजा की शक्तियों के साथ उसके दायित्वों का ऐसा समन्वय अर्थशास्त्र की विशेषता हैI
संदर्भ ग्रंथ
१-अर्थशास्त्र -8.1
२-अर्थशास्त्र- 6.1 -3.6
३-अर्थशास्त्र- 1.17
४-अर्थशास्त्र -1.5
५-अर्थशास्त्र- 1.5.7-8
६-दृष्टव्य -अर्थशास्त्र -1.19 -6.28
७-डॉ बी डी मिश्रा -कौटिल्य राजनीति -पृष्ठ -120 -दृष्टव्य -बी से लेटर -असिएंट इंडियन पॉलीटिकल थॉट इन इंस्टीट्यूशन -पेज -299
८-अर्थशास्त्र -1.9.29
९-अर्थशास्त्र -1.7
१०-वर्ण आश्रम व्यवस्था की रक्षा करना परिवार के संगठन की रक्षा करना
११-शासन के संचालन में राजा जिन अधिकारियों का सहयोग प्राप्त करता है I उनकी नियुक्ति की शक्ति भी राजा में निहित होती है I
१२-कौटिल्य ने विधि के चार स्रोतों का उल्लेख क्या है धर्म ,व्यवहार, चरित्र ,तथा राज्य शासन
१३-कोष वृद्धि, कृषि के उत्थान, पशुधन की रक्षा ,व्यापार संबंधी कार्य करना
१४-प्रजा कल्याणकारी संबंधी कार्य करना I
Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.
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