अर्थशास्त्र में विधि एवं न्याय व्यवस्था

From enIKSwiki
Jump to navigation Jump to search

            कानून के स्रोत-कौटिल्य ने कानून के अग्रलिखित चार प्रकार स्वीकारे हैं I धर्म ,व्यवहार, चरित्र ,तथा राजाज्ञा I कौटिल्य चारों स्रोतों को राष्ट्र के वैधानिक जीवन के चार पाँव माना है I कौटिल्य का कथन है धर्म ,व्यवहार, चरित्र, और राजाज्ञा यह विवाद के निर्णय में सहायक होते हैं I और इसलिए इन्हें राष्ट्र के चार पैर कहा जाता है I इन्हीं पर सारा राष्ट्र टिका होता है I इनमें पूर्ववर्ती की तुलना में पश्चवर्ती अधिक मान्य होता हैI  अर्थात धर्म से व्यवहार, व्यवहार से चरित्र ,और चरित्र की तुलना में राजाज्ञा अधिक स्वीकारणीय होती है I इनमें धर्म सत्य पर ,व्यवहार साक्षियों पर, चरित्र सामाजिक जीवन पर ,तथा शासन राजाज्ञा पर आधारित होता है I

         उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि कौटिल्य ने कानून के अन्य स्रोतों की तुलना में राजा को कानून का सर्वश्रेष्ठ स्रोत माना है I इस प्रकार उन्होंने राजा के कानून निर्माण की शक्ति के द्वारा प्राचीन एवं परंपरागत कानून को तत्कालीन परिस्थितियों व आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करने की चेष्टा की हैI  इसका एक परिणाम यह निकला है कि अर्थशास्त्र में धार्मिक कानून पर लौकिक कानून की श्रेष्ठता को स्थापित किया हैI कौटिल्य के अनुसार कानून ऐसा राजकीय आदेश है जिसे बाध्यता के रूप में लागू किया जाता है I यद्यपि कौटिल्य ने राजाज्ञा को सर्वश्रेष्ठ विधि स्रोत माना है I किंतु उसके आधार पर राजा को किसी प्रकार की विधिक निरंकुशता प्राप्त नहीं होती है I कौटिल्य की राजव्यवस्था में स्वयं राजा विधि के अधीन है और प्रजा सेवक हैI  वस्तुतः कौटिल्य की राजाज्ञा की धारणा न्याय की धारणा का ही विकसित रूप है और इसमें औचित्य एवं विवेक का भाव निहित है I

        कानून के उद्देश्य-अर्थशास्त्र में उपलब्ध विवरण से मालूम होता है कि कानून के कुछ प्रमुख उद्देश्य हैं राजा एवं राज्य की रक्षा करना ,अपराधियों को दंडित करना ,तथा प्रजा के योगक्षेम की वृद्धि करने वाली सरकार की स्थापना करना, अर्थशास्त्र के तीसरे अभिकरण में कौटिल्य ने अनेक विषयों से संबंधित कानून का संहिता करण किया है I जो ऋण स्वामित्व धरोहर विवाह संबंध दाय भाग दास व श्रमिक क्रय विक्रय साझेदारी साहस आघात जुआ आदि से संबंधित है I उन्होंने विभिन्न विषयों से संबंधित कानूनी के साथ ही उनके उल्लंघन के बारे में दंडों की व्यवस्था का भी उल्लेख किया हैI  

न्याय व्यवस्था-प्रशासन की कोई विधाई प्रक्रिया तभी फलिभूत हो सकती है जब न्याय शासन के द्वारा  व्यक्तियों के पारस्परिक संबंधों को अन्वयपूर्ण बनाकर सामाजिक व्यवस्था बनी रहे I अतः कौटिल्य ने न्याय व्यवस्था का भी समय अनुकूल सूक्ष्मतम विवेचन ही नहीं किया अपितु उसके निर्माण तत्वों की व्याख्या भी दी है I राजा प्रधान न्यायाधीश था दंड राज्य का एक अनिवार्य तत्व माना गया हैI दंडाधारी राजा धर्म संरक्षक था अर्थात वर्ण तथा आश्रम धर्म का पालन करवाना ही राजधर्म था I  धर्म के साथ प्रजा की रक्षा करना राजा का धर्म कहा गया है १ I इस स्थापित धर्म का परिवहन राजा अपनी दंड शक्ति अथवा न्याय धर्म के आदेश के द्वारा ही करवा सकता था I अतः कौटिल्य ने राज शासन अथवा राज विधि को धर्म शास्त्रीय निर्देशों से भिन्न सर्वथा अलौकिक स्वरूप में सर्वोच्चता प्रदान की उसका कथन है कि किसी विवाद के निर्णय के चार साधन है धर्म व्यवहार चरित्र और राज शासन इसमें अंतिम राज शासन सर्वाधिक बलवान है २ I  क्योंकि दंड के द्वारा ही राजपुत्र दंडित किए जाते हैं ३ I राज शासन को भी कौटिल्य ने न्याय पर आश्रित कर दिया कदाचित न्याय आश्रित विधि धर्म की यह धारणा धर्म शास्त्री परंपरा के ही क्रम में है भिन्नता यह है कि धर्मशास्त्र में विधि के औचित्य या परिवर्तन में राज शक्ति का उतना महत्व नहीं था जितना प्रथम परंपरा और रीति रिवाज का I कौटिल्य कहता है कि यदि न्याय धर्म के सम्मुख प्रचलित परंपरा या व्यवहारिक शास्त्र का विरोध हो तो धर्म ही प्रधान है I  जहां पर धर्म के विषय में ग्रंथ का न्याय से विरोध हो ऐसे स्थान पर न्याय ही प्रमाण है क्योंकि ग्रंथ के पाठ नष्ट हो सकते हैं ४ I इस प्रकार राज विधि सर्वोपरि है पर उनका आधार तर्काश्रित न्याय होना चाहिए I  साथ इसी आधार पर कौटिल्य राजा को धर्म प्रवर्तक कहता है ५ I इसका अभिप्राय है न्याय के आधार पर स्थापित धर्म को स्वीकृति देते हुए विधि का निर्माण  I

धर्मस्थीय न्याय-स्थापित धर्मो तथा विधि की इसी अवधारणा पर न्याय शासन अवलंबित था I कौटिल्य ने दो तरह के न्यायालय का उल्लेख किया है I धर्मस्थीय ६ और कंटक शोधन ७ धर्मस्थीय न्यायालय में छह न्यायाधीश होते थेI  तीन धर्माध्यक्ष और तीन अमात्य इस न्यायालय को राजा के सीमा प्रांत तथा विभिन्न प्रशासकीय केन्द्रों संग्रहण द्रोणमुख और स्थानीय के प्रधानभूत स्थानों पर स्थापित करने की व्यवस्था थी  ८ I  इस न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत विवाह प्रदानिक विभाग दायभाग गृहवस्तु विक्रय ऋण उपनिधि दास कर्मकार स्वामी संबंध विक्रय साहस पारुष्य तथा अन्य लघु अपराध आदि विवाद के विषय आते हैं  I

कंटक शोधक न्याय-विलंबित न्याय विवंचित न्याय कौटिल्य के सिद्धांत का मूल मंत्र था I अतः उसके न्याय शासन के विकेंद्रीकरण पर विशेष बल दिया हैI  साधारण विवाद समान्यतया स्थानीय संस्थाओं अथवा मध्यस्थों के द्वारा कर लिए जाते थे I  राजा के पास पुनरावेदन करने की मान्यता थी I राजा राज्यसभा में नियमित उपस्थिति रहता था किंतु उसकी अनुपस्थिति में न्याय कार्य प्राणविवाक कर लेता था  I जाति तथा धर्म संबंधी अपराध की परिषद द्वारा अन्वीक्षा कर ली जाती थी ९ I कौटिल्य का कथन है कि दो गांव के बीच सीमाओं के विवाद का निर्णय 5 या 10 पड़ोसी गांव के द्वारा और खेतों के विवाद का निर्णय पड़ोसी ग्राम वृद्धो के द्वारा होना चाहिए I  सब तरह से विवादों के निर्णय पड़ोसी कर सकते हैं १० दंड  विधान का प्रशासन कंटक शोधन न्यायाधीश कारण द्वारा होता था I इस न्यायालय का कार्य समाहर्ता और तीन प्रतिष्ठा अथवा तीन अमात्य के द्वारा संपादित किया जाता था  I उनके कार्यों में गुढ पुरुष उनकी सहायता करते थे ११ I इस न्यायालय पर सभी सामाजिक त,था आर्थिक अपराध ,चोरी, वध, संधि विच्छेद, हठात प्रवेश, कर्मकारों का बहिष्कार, आदि कार्य I मूल्य नियंत्रण के निमित्त व्यावसायिक संघ माप-तोल में प्रवचन तथा अपराधिक उदासीनता संबंधी विवादों के निर्णय का दायित्व था I कौटिल्य ने इन अपराधों को कंटक अथवा प्रजा को पीड़ित करने वाला तत्व कहा हैI  इन गंभीर अपराधों से जन रक्षण निर्विकल्प रूप से किया जा सके I इसलिए उसने समाहर्ता को गुप्तचर की नियुक्ति का आदेश दिया है I

        निष्कर्ष- वर्णाश्रम धर्म का समर्थक होने के कारण कौटिल्य समता सिद्धांत का प्रतिपालक नहीं कर सकता I किंतु उसकी न्याय व्यवस्था १२ मैं पूर्ण विकसित समाज का चिंतन है I उनका प्रयास है कि समाज का कोई अवयव न्याय विधि के अभाव के कारण पीड़ित ना हो सामाजिक भ्रष्टता तथा अनाचार के लिए यथासंभव कम अवसर रहे I मेगास्थनीज ने लिखा है कि स्पष्ट व्यवहार के कारण भारतीयों में विवाद बहुत कम होते हैं I असत्यवादिता के लिए वे सभी दंडित नहीं किए जाते थे I वह विवादार्थी नहीं थे I

                                          संदर्भित ग्रंथ

१-अर्थशास्त्र- 3.1.38 -41

२-अर्थशास्त्र- 39.40.43

३-अर्थशास्त्र- 40

४-अर्थशास्त्र- 44-45

५-अर्थशास्त्र- 38

६-अर्थशास्त्र- 3.1-20

७-अर्थशास्त्र -4.1.13

८-अर्थशास्त्र -3.3.1

९-कैंब्रिज हिस्ट्री ऑफ इंडिया -खंड एक -पृष्ठ संख्या -485

१०-अर्थशास्त्र -3.9.10- 11 ,15 -16- 24

११-अर्थशास्त्र -4.1.1- 4.4.3

१२-अर्थशास्त्र -2.35.1

Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.

Published by,