कौटिल्य का सामाजिक दर्शन
भूमिका-
आचार्य कौटिल्य मूलतः राजनीतिक विचारक हैं किंतु उन्होंने राजनीति व सामाजिक जीवन की पारस्परिक घनिष्ठता को स्वीकारते हुए अपने ग्रंथ और अर्थशास्त्र में समाज के संगठन एवं नियमों पर भी अपने विचार प्रकट किये है I यदुनाथ सरकार के अनुसार उनके ग्रंथ अर्थशास्त्र को समझने के लिए यह संकेत करना पर्याप्त होगा कि उनका उद्देश्य राजा के लिए शासन संबंधी राजनीतिक ग्रंथ की रचना है I निश्चय ही यह समाजशास्त्र पर लिखा गया ग्रंथ नहीं है और हमें राजकीय अधिकारियों व मंत्रियों को दिए गए नियमों को निर्देशों में निहित सामाजिक चिंतन के सिद्धांतों को अलग-अलग करना पड़ता है I
भारतीय ग्रंथो मे सामाजिक दर्शन -
गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि मैंने चार वर्णों की व्यवस्था गुण और कर्म के आधार पर की है १ I ऋग्वेद में वर्णों की उत्पत्ति के संबंध में कहा गया है कि ब्राह्मण विराट पुरुष अर्थात् परमात्मा के मुख, क्षत्रिय भुजाएं, वैश्य जंघाऍ, और शूद्र उनके पांव के समान हैं २ I त्रयी में कहा है कि तीनों वेदों में चारों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ,शूद्र ,वर्णों और चारों ब्रह्मचर्य वानप्रस्थ ,और सन्यास आश्रमों के धर्मों कर्तव्य कर्मों का निरूपण है I जिसे जानकर और जिसका पालन करने के रूप में लोग सही मार्ग को ग्रहण करते हुए अपने लिए अभ्युदय और निश्रेयस को सुनिश्चित कर सकते हैं ३ I
प्राचीन काल में प्रत्येक वर्ण अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए सामाजिक उन्नति में योगदान करता था इसी से सुदृढ़ सामाजिक संगठन की स्थापना हुई I त्रयी के अनुसार ब्राह्मण का धर्म वेद शास्त्रों का स्वयं अध्ययन करना तथा जिज्ञासु शिष्यों यजमानों के निमंत्रण पर उनका पुरोहित बनकर उनसे योग कराना और दिन हीनों को यथाशक्ति दान देना तथा यजमानों से दान लेना है I क्षत्रिय का धर्म वेद शास्त्र आदि ग्रन्थों का अध्ययन करना ,यज्ञ आदि का अनुष्ठान करना ,दान देना, कृषि काम, पशुपालन तथा वैश्यों का व्यापार करना है I शुद्र का धर्म द्विजाति , ब्राह्मण ,क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करना I कृषि काम पशुपालन और व्यापार के अतिरिक्त शिल्प ,गायन, वादन करना तथा चारण भाट का कार्य करना है ४ I
आचार्य कौटिल्य की कल्पना-
एक विशाल राष्ट्र की कल्पना आचार्य कौटिल्य का मुख्य लक्ष्य था I इसी को पूरा करने की तरफ उनका ध्यान था I इसी संदर्भ में उन्होंने वेदों को आधार मानकर प्राचीन वर्णाश्रम व्यवस्था की स्थापना की व उसका समर्थन किया I
वर्ण व्यवस्था
कौटिल्य ने समाज को चार वर्णों में विभक्त किया तथा सामाजिक ढांचे की रक्षा को धर्म से जोड़ा ६ I कौटिल्य ने चारों वर्णों के जो स्वधर्म प्रतिपादित किए गए वे भारत की प्राचीन परंपरा और मर्यादा के अनुसार हैं पर क्रियात्मक दृष्टि से भिन्न-भिन्न वर्णो के लोग केवल इन्ही कार्यों का अनुसरण नहीं करते थे I सैनिक सेवा यद्यपि क्षत्रियों का कार्य माना जाता था परंतु आचार्य कौटिल्य ने ब्राह्मण, वैश्य तथा शूद्रों की सेवा का भी उल्लेख किया है ६ I यज्ञ करना तथा अध्ययन करना शूद्र के लिए वर्जित था परंतु कुछ दशाओं में यह भी यज्ञ कर सकते थे तथा उन्हें वेद आदि की शिक्षा भी दी जाती थी ७ I
कौटिल्य ने इस बात पर जोर दिया कि सब वर्णों को अपने-अपने धर्म का पालन करना चाहिए और राज्य संस्था का एक मुख्य कार्य यही है कि वह सबको अपने-अपने स्वधर्म में स्थिर रखें ८ Iकौटिल्य के अनुसार स्वधर्म का पालन स्वर्ग और मोक्ष के लिए होता है यदि स्वधर्म का अतिक्रमण किया जाए तो अव्यवस्था उत्पन्न हो जाएगी तथा लोक समाज नष्ट हो जाएगा ९ I
आचार्य कौटिल्य ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, तथा शुद्ध इन चारों वर्गों के लोगों को आर्य तथा इसे विभिन्न लोगों को मलेच्छ कहा है I दासों के संबंध में आचार्य का मत है कि आर्यों को दास नहीं बनाया जा सकता चाहे वह शुद्ध ही क्यों ना हो लेकिन मल्लिच्छों को दास के रूप में बेचना व खरीदना दोष नहीं है १० I
आचार्य कौटिल्य ने चार वर्णों के अलावा अनेक वर्ग शंकर लोगों का भी उल्लेख किया है I इस प्रकार के लोगों में अम्बष्ट, निषाद, पाराशव, उग्र ,मागध ,वैदेहक ,सूतक, कुटक, पुलकस, वैण ,चांडाल ,श्वपाक, आदि प्रमुख थे I ब्राह्मण पिता और वैश्य माता से उत्पन्न को अम्बष्ठ ब्राह्मण पिता व शुद्र माता को निषद और पारशव क्षत्रिय पिता शुद्ध माता के संतान को वैदेहक शुद्र पिता व क्षत्रिय माता के संतान को मागद्य क्षत्रिय पिता व ब्राह्मण माता की संतान को वैदेहक शुद्र पिता वह वैश्य माता की संतान को आयोगव शुद्र पिता व ब्राह्मण माता के संतान को चांडाल तथा शुद्र की क्षत्रिय स्त्री उत्पन्न संतान को क्षत कहा गया है ११ I
कौटिल्य ने इन सब वर्ण शंकर जातियों को शुद्रासधर्मा कहा है I वस्तुतः इनकी स्थिति शुद्रों के समकक्ष मानी जाती थी I इनके अतिरिक्त आचार्य कौटिल्य ने अवान्तर शंकर जातियों का भी वर्णन किया है I यह अवान्तर शंकर जातियां वर्ण शंकरों के मूल से बनती थी I उनके अंतर्गत कुकुट पुल्कस वैण कुशीलव श्वापक आदि जातियां आती थी I संक्षेप में कौटिल्य ने शुद्र को संपत्ति का अधिकार दिया है और उसे आर्यों के संपूर्ण समाज का सामान्य एवं अनिवार्य अंग माना है I कौटिल्य की वर्ण व्यवस्था उदार अर्थ में सामाजिक श्रम विभाजन की पूर्ति करती है और यह सामाजिक एकता के साथ ही समान नागरिक के सिद्धांत को विकसित करने का प्रयास करती है I
आश्रम व्यवस्था-
इसके इतर आश्रम व्यवस्था हिंदू सामाजिक संगठन का एक मूल आधार है १२ I ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ , और सन्यास इन चार आश्रम के माध्यम से व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास करते हुए एक उन्नत समाज के निर्माण में योगदान करता है I आश्रम व्यवस्था का प्रारंभ उपनिषद काल से माना जाता है I इस व्यवस्था की विकास प्रक्रिया में प्रारंभिक स्तर पर केवल तीन आश्रमों का ही वर्णन मिलता है I प्रारंभ में वानप्रस्थ और सन्यान्स आश्रम एक दूसरे से मिले हुए थे I जिन्हें कालांतर में पृथक किया गया १३ I
मनुस्मृति में
भी तीन आश्रमों का उल्लेख मिलता है १४ I जाबालि उपनिषद में सर्वप्रथम चारों आश्रमों का व्यवस्थित रूप में वर्णन आया है १५ I ब्रह्मचर्य , गृहस्थ ,वानप्रस्थ और सन्यास इन चार आश्रमों के माध्यम से व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास करते हुए एक उन्नत समाज के निर्माण में योगदान कर सकता है I धर्म ,अर्थ, काम, और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों को मनुष्य तभी प्राप्त कर सकता है जब वह मानसिक शारीरिक नैतिक और आध्यात्मिक चौमुखी विकास करें I विभिन्न आश्रमों में रहते हुए व्यक्ति स्वयं में इन गुणों का विकास करके जीवन के अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति के लिए स्वयं को योग्य बनाता है I
महाभारत में
व्यास जी ने कहा है कि जीवन के चार विश्राम स्थल अर्थात आश्रम व्यक्ति के विकास की चार सीढ़ियां हैं I इन पर क्रम से चढ़ते हुए व्यक्ति ब्रह्मा अर्थात मोक्ष प्राप्त कर सकता है १६ I कौटिल्य ने पुरातन व्यवस्था से ब्रह्मचर्य गृहस्थ वानप्रस्थ एवं सन्यास इन चारों आश्रमों में विश्वास प्रकट किया है I उन्होंने प्रत्येक आश्रम में व्यक्तियों के कार्यों का अलग-अलग निर्धारण भी किया है I
गृहस्थ आश्रम
गृहस्थ आश्रम के धर्म कर्तव्य कर्म का निरूपण करते हुए आचार्य चाणक्य ने कहा है कि उसे अपनी पैतृक परंपरा से चले आ रहे व्यवसाय को अपनाकर अपनी आजीविका का उपार्जन करना चाहिए I पत्नी के ऋतुमयी रजोनिवृत्ति के उपरांत रितुस्नान होने पर ही उसके साथ समागम करके संतान उत्पन्न करने चाहिए I उसे देवों पितरों अतिथियों और सेवकों के लिए अन्न जलादि की व्यवस्था के उपरांत ही अवशिष्ट भोजन ग्रहण करना चाहिए १७ I
ब्रह्मचर्य आश्रम
ब्रह्मचारी का धर्म कर्तव्य कर्म है कि वह नित्य स्वाध्याय यज्ञ योग तथा स्नान करें ,भिक्षा मांग कर क्षुधानिवृत्ति करें ,और इस प्रकार इस आश्रम में अपना पूरा समय अर्थात ब्रह्मचर्य की अवधि पर्यंत गुरु के गुरु की अनुपस्थिति में गुरु पुत्र के अथवा किसी सामान शाखा वाले अपने से वरिष्ठ किसी सहपाठी के समीप अनुशासन में ही रहे १८ I
वानप्रस्थ आश्रम
वानप्रस्थ का धर्म है कि वह ब्रह्मचर्य पूर्वक जीवन बिताये अर्थात स्त्री संग से सर्वथा दूर रहे तथा स्वाध्याय एवं यज्ञ यागदि का नित्य अनुष्ठान करें उसे भूमि पर चयन करना तथा शरीर पर मृग चर्म धारण करना चाहिए ,उसे प्रतिदिन स्नान अग्निहोत्र, देवों ,पितरों और अतिथियों की सेवा करनी चाहिए I उसे वन में उत्पन्न होने वाले कंदमूल, शकरकंदी ,गाजर ,आलू ,शलजम ,मूली ,तथा गन्ना आदि खाकर ही जीवन बिताना चाहिए १९ I
सन्यास आश्रम
सन्यासी का धर्म है कि उसे जितेंद्रिय होना चाहिए अर्थात इंद्रियों के विषयों रूप, रस, गंध ,शब्द, और स्पर्श आदि से सर्वथा मुक्त होना चाहिए I उसे ना तो किसी नए कार्यों के आरंभ करने की बात सोचनी चाहिए और ना ही संग्रह शील होना चाहिए I उसे समुदाय से अलग अकेले रहना चाहिए तथा भिक्षा मांग कर निर्वाह करना चाहिए I उसे मात्र प्राण रक्षा के लिए अपेक्षित भोजन करना चाहिए I उसे वन में भी एक ही स्थान पर स्थाई रूप से नहीं रहना चाहिए अपितु परी अर्थात चारों ओर व्रजन अर्थात घूमना घूमते रहना चाहिए I इस प्रकार घूमते रहने के रूप में उसे अपना निवास स्थान बदलते रहना चाहिए २० I उसे मन वचन और कर्म से अपने को बाहर व भीतर से पवित्र बनाए रखना चाहिए २१ I चारों वर्णों और चारों आश्रमों के लोगों के लिए समान रूप से यह एक सामान्य धर्म है कि वे २२ किसी प्रकार की हिंसा न करें अर्थात किसी भी जीव को मन वचन व कम से किसी प्रकार का दुख ना पहुंचाएं I सदा सत्य भाषण करें अर्थात छल कपट का सर्वथा परित्याग करें I पवित्र बने रहें अर्थात किसी भी प्रकार का लोभ को ना अपनाए I किसी से ईष्या द्वेष न करें जीवमात्र के प्रति दयाशील एवं सहनशील बने रहे I
निष्कर्ष
आचार्य महोदय के अनुसार अपने लिए नियत धर्म का पालन करने से जहां स्वर्ग व मोक्ष की प्राप्ति होती है वहां उसका उल्लंघन अर्थात पालन न करने से वर्ण व कर्म में संकरता आ जाती है I इसका परिणाम यह होता है कि लोकमर्यादा नष्ट हो जाती है I
संदर्भ ग्रंथ
१-ऋग्वेद -पुरुष सूक्त
२- चातुर्वर्ण्य मया सृष्ट गुणकार्म विभागतः-भागवत गीता
३-कौटिल्य अर्थशास्त्र- 1/2/2
४-कौटिल्य अर्थशास्त्र- 1/2/3
५-कौटिल्य अर्थशास्त्र में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शुद्ध के अपने-अपने धर्म बताए गए हैं
६-कौटिल्य ने लिखा है कि -आचार्यों का मत था ब्राह्मण ,क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रों की सेनो में ब्राह्मणों की सेवा श्रेष्ठ होती है क्योंकि उनमें तेज की प्रधानता रहती है परंतु कौटिल्य का मत इससे भिन्न है ब्राह्मण सेवा को शत्रु प्रणिपात द्वारा अपने पक्ष में कर सकता है I अतः ऐसे क्षत्री को श्रेष्ठ समझना चाहिए जो की प्रहरण विज्ञा से सशिक्षित हो अथवा ऐसी वैश्य तथा शुद्र सेना भी श्रेष्ठ है जिनके सैनिक संख्या में बहुत अधिक हो I
७- एम० वी० कृष्णराव ने कौटिल्य की वर्ण व्यवस्था की विशेषता बताते हुए कहा है कि- कौटिल्य ने ब्राह्मणों को सामाजिक वरिष्ठता देते हुए भी सूत्रों को ब्राह्मण के समान ही कुछ व्यावहारिक अधिकार प्रदान किए हैं जो उससे पहले सोचे भी नहीं गए थे I
८-बंदोपाध्याय का मत है कि- कौटिल्य ब्राह्मण था और इस जाति के सामाजिक विशेषाधिकारों में विश्वास नहीं करता है कि साधारण जनमात्र दूसरों के लिए जिए उसने सामाजिक व आर्थिक जीवन के चौथे वर्ण के सदस्यों को सामुदायिक जीवन का आधार माना I इस प्रकार उसके काल की दृष्टि से उसका सामाजिक दृष्टिकोण उदार था I वह शुद्ध को भी आर्य समुदाय का सदस्य मानता था I
९-कौटिल्य अर्थशास्त्र -1/3
१०-कौटिल्य अर्थशास्त्र- वाचस्पति गैरोला- 3/3/3
११-पूर्ववत
१२-भारतीय सामाजिक संस्थाएं- मोतीलाल गुप्ता -पृष्ठ 44
१३-वैदिक इंडेक्स मैकडोचेल एवं कीथ- भाग 1- पृष्ठ 68/ 69, एवं हिस्ट्री ऑफ संस्कृत लिटरेचर सी० वी० वैद्य -भाग 1 –क्षेत्र- सेकंड
१४-मनुस्मृति -2/230
१५-भारतीय सामाजिक संस्थाएं -मोतीलाल गुप्ता -पृष्ठ -44
१६-महाभारत -शांति पर्व- 242/5
१७-कौटिल्य अर्थशास्त्र- 1/2/4
१८-कौटिल्य अर्थशास्त्र -1/2/5
Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.
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