चतुर्पुरुषार्थ
प्राचीन भारतीय ऋषि-मुनियों ने भारतीय समाज को उचित दिशा देने के लिए कई अवधारणाओं का निर्माण किया। समाज को वर्णों में विभक्त किया गया जिससे की वह वर्ण अपने विशिष्ट योगदान के माध्यम से समाज की भलाई में भागीदार बन सके। व्यक्ति के जीवनकाल को भी विभिन्न चरणों में विभक्त किया गया ताकि व्यक्ति अपने आत्म के स्तर पर योगदान सुनिश्चित कर सके। इसी तरह पुरुषार्थ में भी हमें प्राचीन भारतीय ऋषि-मुनियों की समाज को उचित दिशा देने की योजना की अवधारणा देखने को मिलती है।
पुरुषार्थ मानवीय क्रियाओं का लक्ष्य हैं। दांडेकर के अनुसार पुरुषार्थ शब्द का शाब्दिक अर्थ है मनुष्य द्वारा निर्धारित लक्ष्य या गंतव्य[1]। यह हिंदू परंपरा की एक प्रमुख अवधारणा है, जो मानव जीवन के चार उचित लक्ष्यों या उद्देश्यों को संदर्भित करती है। शास्त्रों में चार पुरुषार्थों का वर्णन किया गया हैं; धर्म (नैतिक मूल्य, सही आचरण), अर्थ (आर्थिक मूल्य, समृद्धि), काम (यौन, भावनात्मक व कलात्मक जीवन की संतुष्टि) और मोक्ष (मुक्ति, आत्म-साक्षात्कार)। पुरुषार्थ मुख्य रूप से दो व्यापक भागों में विभक्त हैं, एक है ‘प्रवृत्ति’ जिसका अर्थ है खोज और दूसरा है ‘निवृत्ति’ जिसका अर्थ है त्याग। धर्म, अर्थ और काम प्रवृत्ति से संबंधित हैं, जबकि मोक्ष निवृत्ति से संबंधित है[2]। पुरुषार्थ मानवीय मूल्य हैं, जिनका मनुष्य द्वारा सचेत रूप से अनुसरण किया जाता है[3]।
पुरुषार्थ एक मिश्रित संस्कृत शब्द है जो पुरुष और अर्थ से मिलकर बना एक। यहाँ पुरुष का अर्थ ‘आत्मा’ या ‘ब्रह्मांड के मूल स्रोत’ से है। अर्थ का तात्पर्य ‘उद्देश्य’ या किसी ‘इच्छा की वस्तु’ से है। इस तरह, पुरुषार्थ का शाब्दिक अर्थ ‘मानव का उद्देश्य’ या ‘आत्मा का उद्देश्य’ है। धर्मशास्त्रों के अनुसार पुरुषार्थ के रूप में प्रत्येक मनुष्य के पास चार लक्ष्य होते है, जिनकी प्राप्ति से वह एक पूर्ण व सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है।
पुरुषार्थ चार होते है; धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। प्रथम तीन पुरुषार्थों; धर्म, अर्थ और काम, की तिकड़ी को ‘त्रिवर्ग’ कहा गया है। हिंदू प्रणाली के अनुसार मानव जीवन का लक्ष्य है मोक्ष की प्राप्ति करना है। मानव अपने संपूर्ण काल खंड में मोक्ष प्राप्ति के लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता है। मोक्ष की प्राप्ति अन्य तीन पुरुषार्थों के माध्यम से की जा सकती है। मनुष्य के लिए सभी पुरुषार्थों को ही महत्वपूर्ण माना गया है लेकिन प्रथम तीन पुरुषार्थों में से सबसे अधिक महत्व धर्म को दिया गया है, अर्थ और काम क्रमशः बाद में आते है। यदि कोई व्यक्ति अर्थ और काम के बजाए सिर्फ़ धर्म के मार्ग का अनुसरण करता है तो वह मोक्ष प्राप्त कर सकता है, वहीं यदि किसी व्यक्ति के जीवन में अर्थ या काम की अधिकता एवं धर्म की निम्नता हो, ऐसे में उस व्यक्ति द्वारा मोक्ष की प्राप्ति संभव नहीं है। धर्म सर्वोपरि है, यदि कोई धर्म की उपेक्षा कर अर्थ (लाभ) और काम (सुख) को महत्त्वता देता है तो इससे सामाजिक अराजकता का जन्म होता है। धर्म के बाद अर्थ की महत्त्वता अधिक है जिसे काम से पूर्व रखा गया है। सबसे अंतिम में काम का स्थान है[4]।
हालाँकि कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में अर्थ को धर्म एवं काम का आधार माना है। कौटिल्य का मानना है कि जब तक एक व्यक्ति अपने स्वयं के स्तर पर आर्थिक रूप में समृद्ध और सुरक्षित नहीं होगा तब तक उसके लिए जीवन में नैतिकता और कामुकता दोनों ही कठिन है। कौटिल्य का तर्क है कि निर्धनता बुराई और घृणा को जन्म देती है वही दूसरी तरफ़ समृद्धि सद्गुण और प्रेम को जन्म देने में सहायक है[5]। कौटिल्य का यह भी मत है कि त्रिवर्ग परस्पर आपस में जुड़े हुए हैं, और किसी भी व्यक्ति को जीवन का आनंद लेने, सद्गुण युक्त व्यवहार करने, व धन सृजन की खोज को नहीं छोड़ना चाहिए। तीनों में से किसी एक पुरुषार्थ को अत्यधिक बल देने और अन्य दो को पूरी तरह से ख़ारिज कर देने से तीनों को नुक़सान पहुँचाता है[6]। प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण संतुष्टि व सुख से भरा जीवन व्यतीत करना चाहिए। सुख व संतुष्टि के लिए ज़रूरतों और इच्छाओं का पूरा होना आवश्यक है, जिसके लिए पर्याप्त साधन होना ज़रूरी है। इन सब संचयन में ध्यान रखने योग्य बात है धर्म का अनुसरण, अथार्थ अर्थ व काम की प्राप्ति में धर्म की अनुरूपता आवश्यक है। इसलिए भारतीय सामाजिक दर्शन को बारीकी से समझने के लिए पुरुषार्थ की समझ बुनियादी है। अर्थ और धर्म साधन है जबकि काम और मोक्ष साध्य हैं, कहने का तात्पर्य यह है कि मोक्ष लक्ष्य है जिसकी प्राप्ति मनुष्य धर्म की अनुरूपता में धन के माध्यम से जीवन के सुखों का आनंद लेते हुए करता है[7]।
अब एक-एक कर चारों पुरुषार्थों को संक्षिप्त में समझने का प्रयास करते है।
धर्म - धर्म एक बहुआयामी अवधारणा है। धर्म का उद्भव ऋत की अवधारणा से हुआ है इसलिए धर्म की अवधारणा भी जीवन और ब्रह्मांड की अनुरूपता पर जोर देती है। इसमें कर्तव्य, अधिकार, कानून, आचरण, गुण और जीने का सही तरीका शामिल है। धर्म प्रत्येक व्यक्ति के धार्मिक कर्तव्य, नैतिक अधिकार और कर्तव्यों के साथ-साथ सामाजिक व्यवस्था, सही आचरण और सद्गुणों को उल्लेखित करता है।
अर्थ - आर्थिक मूल्य, समृद्धि और जीवन के साधन को दर्शाता है। अर्थ का तात्पर्य कला, भूमि, सोना, मवेशी, धन, उपकरण और मित्रों के अर्जन व सुरक्षा से है[8]। अर्थ व्यक्ति को उसकी इच्छा अनुरूप स्थिति में लता है। इसमें धन, आजीविका, वित्तीय सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि शामिल है। अर्थ की उचित खोज मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है।
काम - इच्छा की संतुष्टि, कामना, भावनाओं या इंद्रियों का सुख काम है। पांच इंद्रियों; सुनने, महसूस करने, देखने, चखने व सूंघने, द्वारा उपयुक्त वस्तुओं का आनंद लेना काम है। इस आनंद में मन और आत्मा दोनों शामिल है। ‘इसका घटक इंद्रिय और उसके विषय के बीच एक विशेष संपर्क है, और उस संपर्क से उत्पन्न होने वाली आनंद की चेतना को काम कहा जाता है’[9]। काम की पूर्ति धर्म व अर्थ के उल्लंघन के बिना की जानी चाहिए। कुछ विचारको ने काम को पुरुषार्थों में सबसे निम्न समझा है। वही चार्वाक दर्शन में काम को श्रेष्ठतम माना गया है।
मोक्ष – मुक्ति, अथार्थ मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति। मोक्ष को इसी जीवन में स्वतंत्रता, आत्म-ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार के रूप में देखा गया है।
हिंदू प्रणाली मनुष्य को वैचारिक स्वतंत्रता प्रदान करने के साथ-साथ उसे नियमों की माला में भी पिरोकर रखती है। इसलिए वर्णाश्रमधर्म की पालना को सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य माना गया है। प्रत्येक मनुष्य का उसके वर्ण व जीवन स्तर पर उसका जीवन किस ओर लक्षित हो इसलिए पृषार्थ की अवधारणा को निर्मित किया गया। चार पुरुषार्थों का सिद्धांत हिंदू प्रणाली का एक दिलचस्प और मूल्यवान पहलू है जो मनुष्य को सायमित व उत्साह पूर्ण जीवन जीने के लिए निर्देशित करता है।
[1] आर० एन० दांडेकर, “द थ्योरी ऑफ़ पुरुषार्थस: ए रीथिंकिंग,” अनल्स ऑफ़ द भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टिट्यूट 68, संख्या 1/4, (1987): 661-671.
[2] एल्बन जी० विडगेरी, “द प्रिंसिपल्स ऑफ़ हिंदू एथिक्स,” इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एथिक्स 40, संख्या 2, (1930): 237.
[3] दांडेकर, द थ्योरी ऑफ़ पुरुषार्थस, 663.
[4] द हिंदू काम शास्त्र सोसाइटी, द कामसूत्र ऑफ़ वात्स्यायन, (यूनिवर्सिटी ऑफ़ टोरंटो आर्काइव, 1925), 8.
[5] गैविन फ्लड, “द मीनिंग एंड कंटेक्स्ट ऑफ़ द पुरुषार्थ”, संपादक जूलियस लिपनर, द फ्रूट्स ऑफ़ अवर डिज़ाइरिंग, (बयेउक्स, 1997), 16–21.
[6] अशोक एस० चौसालकर, “मेथोडोलॉजी ऑफ़ कौटिल्यास अर्थशास्त्र”, द इंडियन जर्नल ऑफ पॉलिटिकल साइंस, 65, संख्या 1, (2004): 55-76.
[7] अरविंद शर्मा, “द पुरुषार्थ: ऐन ऐक्सिनोलॉजिकल एक्सप्लोरेशन ऑफ़ हिंदुइज्म”, द जर्नल ऑफ रिलीजियस एथिक्स, 27, अंक 2, (1999): 228.
[8] द हिंदू काम शास्त्र सोसाइटी, द कामसूत्र ऑफ़ वात्स्यायन, 8.
[9] वही.
Authored by Prof. SriPrakash Singh, Director South Campus Delhi University.
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