धर्म
धर्म (धर्म की भारतीय अवधारणा)
प्रत्येक भाषा एवं संस्कृति में कुछ ऐसे शब्द होते है जिनको समझने से उस संस्कृति की गहराइयों तक उतरा जा सकता है। यह शब्द अपने में उस संस्कृति का ज्ञान, इतिहास एवं परंपराओं को समेटे हुए होते है। ऐसे शब्दों का किसी अन्य भाषा में सटीक अनुवाद करना संभव नहीं होता। किसी दूसरी भाषा में अनुवाद से मूल शब्द के भाव का ह्रास होने की संभावना बानी रहती है। ‘धर्म’ हिन्दू प्रणाली का ऐसा ही एक शब्द है, जिसमें हजारों वर्षों से जीवंत हिंदू संस्कृति और दर्शन का सार समाहित है। वैदिक काल से वर्तमान समय तक हिंदू प्रणाली में ‘धर्म’ की अवधारणा का प्रभाव प्रमुख रूप से देखने को मिलता है। धर्म की अवधारणा संभवतः भारतीय दर्शन की सबसे चर्चित अवधारणा है जिसकी व्याख्या अनेकों दार्शनिकों द्वारा अलग-अलग ढंग से की जाती रही है।
धर्म शब्द का सटीक अनुवाद लगभग किसी भी भाषा में संभव नहीं है। धर्म के लिए अंग्रेज़ी भाषा में आमतौर पर ‘रिलिजन’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। रिलिजन का तात्पर्य किसी निश्चित थिओलॉजी में विश्वास, कुछ अनुष्ठानों के पालन, एक संस्थागत पदानुक्रम का पालन और समानता की भावना से है, दूसरी ओर धर्म थिओलॉजी व संस्थाओं के बजाय व्यक्ति के जीवन पथ का प्रतिनिधित्व करता है[1]।
धर्म शब्द संस्कृत की धातु ‘धृ’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘धारण करना’। धर्म शब्द के अर्थ में समय के साथ परिवर्तन देखने को मिलता है। ‘वैदिक धर्म की अवधारणा में नैतिक दृष्टिकोण, नैतिक सद्गुण व विभिन्न जातियों और वर्णों के विशेष सामाजिक कर्तव्य देखने को मिलते है। उपनिषद में धर्म व्यक्ति के व्यक्तित्व के आत्म-विकास के साथ-साथ समाजीकरण को भी संदर्भित करता है। छांदोग्य उपनिषद धर्म में शिक्षा, चिंतन और तपस्या को संदर्भित करता है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र धर्म को एक सामाजिक कर्तव्य, सत्य पर आधारित नैतिक और नागरिक कानून के रूप में देखता है। वहीं धर्मशास्त्रीय परंपरा में भी धर्म को कर्तव्य के रूप में देखा गया है। महाभारत ने धर्म को अहिंसा और करुणा के रूप में वर्णित किया है। गौतम धर्मसूत्र वेदों को धर्म का मुख्य स्रोत मानता है और आपस्तंब धर्मसूत्र के अनुसार धर्म की सत्ता वेदों और धर्म को जानने वालों की सहमति से है’[2]।
पी० वी० काणे के अनुसार धर्म शब्द अपनी लंबी विकास यात्रा के दौरान कई उतार-चढ़ावों व बदलावों को पार करने के पश्चात अपने विशिष्ट स्तर पर पहुंचा है। धर्म को एक व्यक्ति के विशेषाधिकार, कर्तव्य और दायित्व के रूप में, व्यक्ति के आचरण के मानक के रूप में तथा जीवन के किसी विशेष चरण के रूप में समझा गया। तैत्तिरीय उपनिषद, भगवद् गीता और विभिन्न धर्मशास्त्रों में धर्म का जो अर्थ स्थापित होता है वह है सत्य बोलना, (अपने) धर्म का पालन करना आदि[3]। धर्म को सर्वोच्च मानते हुए मनुस्मृति में लिखा गया है की जो कोई धर्म को नष्ट करता है, धर्म उसे नष्ट कर देता है एवं जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है[4]। धर्म मनुष्य के दायित्वों को परिभाषित करता है और प्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह अपने दायित्वों का पालन करे, इनकी पालना हर उस मनुष्य के लिए बाध्कारी है जो यह चाहता है कि उसे उसके द्वारा किए गए कार्यों का उसे सफल परिणाम मिले[5]। मनुस्मृति में धर्म के पाँच स्रोतों का उल्लेख किया गया है, पहला और सबसे महत्वपूर्ण वेद है, दूसरा वेदों को जानने वालों की परम्पराएँ और कार्य, उसके बाद पुण्यात्मा लोगों का दिखाया गया मार्ग, और अंतिम में वे कार्य हैं जो व्यक्ति अपनी आत्म-संतुष्टि के लिए करता है[6]। धर्म की अवधारणा सैद्धांतिक होने के साथ-साथ व्यावहारिक भी है। यह नैतिक मूल्यों की खोज है। महाकाव्यों, पौराणिक किंवदंतियों एवं लोक-कथाओं के लोकप्रिय चरित्र-पत्रों द्वारा चित्रित धर्म की अवधारणा जन-जन तक पहुँच कर जो आम व ख़ास वर्ग को एक ही धागे में पिरोती है[7]।
धर्म की कोई भी व्याख्या सीमित नहीं है, व ना धर्म का कोई स्वरूप सीमित या बाध्य है। समाज के सभी वर्ग व वर्ण के लोगों ने धर्म को अपने-अपने तरीक़े से अपनाया व व्याख्या की है। यही कारण है कि हमें भिन्न-भिन्न स्थानों पर इसके भिन्न-भिन्न रंग-रूप देखने को मिलते है। भारतीय उपमहाद्वीप पर जीतने भी समाजों व पंथों का उद्भव हुआ उन सभी में धर्म की अमित छाप देखने को मिलती है। यहाँ तक कि वे पंथ जिनका उद्भव भारत भूमि पर नहीं हुआ, परंतु जब उनका आगमन भारत की धरती पर हुआ तब वे भी धर्म की छाप से दूर ना रह सके।
भारतीय दर्शन में अवधारणाओं को एक-दूसरे के साथ जोड़कर व एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखा जाता हैं। धर्म एक लचीला शब्द है जिसका कोई एक निश्चित अर्थ नहीं है, अलग-अलग स्थानों या स्थितियों के लिए इसके अलग-अलग अर्थ हैं। बिनोय कुमार सरकार के अनुसार, ‘मुख्य रूप से पाँच क्षेत्र हैं जिन्हें धर्म के रूप में समझा जा सकता है। पहला है धर्म या पंथ, जो धर्मशास्त्र की एक श्रेणी है; दूसरा है सद्गुण, जो नैतिकता की एक श्रेणी है; तीसरा है कानून, जो न्यायशास्त्र की एक श्रेणी है; चौथा है न्याय; और अंतिम है कर्तव्य। राजनीतिक सिद्धांत को कानून, न्याय और कर्तव्य तक ही सीमित रखना चाहिए, पहले और दूसरे क्षेत्र की उपेक्षा करनी चाहिए’[8]। साथ ही शास्त्रों में कानून, कर्तव्य, आचरण के मानदंड, वस्तुओं की प्रकृति, धार्मिकता, नैतिकता आदि के रूप में भी धर्म को परिभाषित किया गया है।
प्रमुख ग्रंथों में धर्म के बारे में दिए गए विचारों के माध्यम से धर्म की अवधारणा को समझने का प्रयास किया जा सकता हैं। मनुस्मृति में धर्म की व्याख्या करते हुए कहा गया हैं:
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्[9]॥९२॥
धृति (धैर्य ), क्षमा, दम (संयम), अस्तेय (चोरी न करना ), शौच (शारीरिक और मानसिक पवित्रता ), इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों पर नियंत्रण), धी (बुद्धि), विद्या, सत्य और अक्रोध - ये धर्म के दस लक्षण हैं।
याज्ञवल्क्य ने साधारण धर्म का वर्णन करते हुए धर्म के नौ लक्षण बताये हैं:
अहिंसा सत्यम्स्तेयम् सौचमिन्द्रियनिग्रः।
दानं दामो दया शान्तिः सर्वेषां धर्मसाधानम्[10]॥६४॥
अहंकार, सत्य, अस्तेय, पवित्रता, इन्द्रियों का संयम, उदारता, आत्मसंयम, दया और क्षमा ये सबके लिए धर्म के साधन हैं।
महाभारत के शांतिपर्व में भी धर्म के विषय में लिखा है कि ‘धर्म को धारण करो, जो तुम्हें स्वयं के लिए अच्छा न लगे, वैसा दूसरों के साथ मत करो। जो वस्तु तुम अपने लिए चाहते हो, वही दूसरों को भी मिले, ऐसा विचार करना चाहिए’[11]।
धर्म की अवधारणा दूरगामी थी। धर्म का अभिप्राय पंथ से नहीं अपितु सम्पूर्ण जीवन-पद्धति या आचरण-शैली से है। ‘धर्म व्यक्ति के व्यक्तिगत एवं सामाजिक सदस्य के रूप में उसके कार्यों और गतिविधियों को विनियमित करता है, धर्म का उद्देश्य मनुष्य का क्रमिक विकास करना और उसे मानव अस्तित्व के लक्ष्य तक पहुँचने में सक्षम बनाना है’[12]। धर्म हिंदू राजनीतिक, सामाजिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक परंपराओं का आधार है। धर्म वर्तमान समय के अन्य पंथों की तरह कोई संस्था नहीं है, बल्कि यह नाविक का दिशासूचक है जिसकी सहायता से वह जीवन रूपी जहाज को भंवर से निकालकर अपने गंतव्य तक पहुंचा सकता है।
[1] विश्वनाथ प्रसाद वर्मा, स्टडीज़ इन हिंदू पोलिटिकल थॉट एंड इट्स मेटाफ़िसिकल फ़ाउंडेशंस (दिल्ली: मोतीलाल बनारसीदास, 1974), 113-114.
[2] वही, 114-151.
[3] पाण्डुरंग वामन काणे, हिस्ट्री ऑफ़ धर्मशास्त्र: अन्सिएंट एंड मेडिवल रिलीजियस एंड इविल लॉ खंड द्वितीय (पूना: भण्डारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टिट्यूट, 1941), 2.
[4] धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥१५॥ - मनुस्मृति 8.15.
[5] रॉबर्ट लिंगत, द क्लासिक लॉ ऑफ़ इंडिया, अनुवादित जे० डंकन डेरेट (नई दिल्ली: ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1973), 4.
[6] वही, 29.
[7] जी० सी० पांडे, डाइमेंशन ऑफ़ एन्सिएंट इण्डियन सोशल हिस्ट्री (नई दिल्ली: बुक्स & बुक्स, 1984), 126.
[8] बिनॉय कुमार सरकार, द पोलिटिकल इंस्टीट्यूशंस एंड थ्योरीज़ ऑफ़ द हिन्दूस: ए स्टडी इन कम्पेरेटिव पॉलिटिक्स (लीजपज़िग: वेरलाग वॉन मार्केट एंड पीटर्स, 1922), 206.
[9] मनुस्मृति 6.92.
[10] याज्ञवल्क्य स्मृति 1.122.
[11] श्रूयतां धमिसविस्वं श्रुत्वा चाप्यवधायिताम्।
आत्मनिः प्रततकूलातन परेषां न समाचरेत्॥
यद्यदात्मतन चेच्छेत तत्परस्यातप तचरतयेत्।
आत्मनिः प्रततकूलातन परेषां न समाचरेत्॥
[12] काणे, हिस्ट्री ऑफ़ धर्मशास्त्र, 1941, 2.
Authored by Prof. SriPrakash Singh, Director South Campus, Delhi University.
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