पुराणों में वृक्षारोपण संचेतना

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भूमिका

पेडों की कटान, निर्वनीकरण, और विकास के नए मॉडल ने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है। वृक्षों के प्रति अनुराग कम हो गया है। पुराण साहित्य में वृक्षों को लगाने, उनको व्यर्थ ही काटने पर दण्ड, आदि का विधान धर्म के आलोक में बताया है। प्रस्तुत लेख में वृक्षारोपण को प्रमुखता देने, अकारण वृक्ष काटने के प्रति हतोत्साहित करने, वृक्ष वृद्धि के पुराने भारतीय ज्ञान को उजागर करने का एक प्रयास किया गया है। इस सन्दर्भ में मत्स्य, अग्नि, भविष्य और पद्म पुराणों के उल्लेखों के आधार पर वृक्ष्यायुर्वेद, वृक्षारोपण का महत्व, पीपल पेड लगाने का महत्व, वृक्षों की वृद्धि के उपाय, वृक्षों की सिंचाई, वृक्ष काटने पर दण्ड व्यवस्था आदि पौराणिक ज्ञान प्रस्तुत किए गए हैं जो वर्तमान सन्दर्भ में पर्यावरण की रक्षा के लिए जनजागरूकता हेतु प्रासंगिक है।

सिंहावलोकन

·   भूमिका

·   वृक्ष्यायुर्वेद

·   वृक्षारोपण का महत्व

·   पीपल पेड लगाने का महत्व

·   वृक्षों की वृद्धि के उपाय

·   वृक्षों की सिंचाई

·   वृक्ष काटने पर दण्ड व्यवस्था

परम्परा (Parampara)

वर्तमान युग में पूरा विश्व पर्यावरण संकट से जूझ रहा है, वन उजड रहे हैं, वृक्षों की कटान जारी है, हवा प्रदूषित हो चुकी है। विकास के दौर में भी हमें पुराणों में संरक्षित अपनी प्राचीन परम्पराओं की ओर पुनः ध्यान देना होगा जिसमें वृक्षों को लगाने और उसकी उपयोगिता के प्रति पौराणिक ऋषियों ने जागरूक किया जिससे स्वस्थ पर्यावरण स्थापित करने में मदद मिल सके।पुराणों में वृक्ष धर्मपुत्र कहे गए, अर्थात मनुष्य जिसप्रकार अपने पुत्र का पालनपोषण करता है उसी प्रकार उसे वृक्षों की रक्षा करनी चाहिए। वृक्ष पुत्र के समान ही व्यक्ति को तारतें हैं।

दृष्टि

वृक्ष्यायुर्वेद

अग्निपुराण में धन्वन्तरि द्वारा बताए गए वृक्ष्यायुर्वेद में कृषि तकनीक आधारित ज्ञान है जो भारतीय कृषिपद्धति का परम्परिक ज्ञान है।

अग्निपुराण में कहा गया है कि घर के उत्तर में पाकड का, पूर्व में वरगद , दक्षिण में आम्र, पश्चिम में पीपल का पेड उत्तम माना गया है।(1) यह भी कहा गया है कि घर के वामपार्श्व में उद्यान लगाना चाहिए(2)। उद्यान में तिल या फूल वाले वृक्षों का लगाना चाहिए। वृक्षों का एक दूसरे से अन्तर बीस हाथ पर उत्तम माना गया है, सोलह हाथ का अन्तर मध्यम हैऔर बारह हाथ का अन्तर अधम है,क्योकि घने वृक्षों में फल नही लगते (3) (नोट- एक हाथ चौबीस अंगुल का माना गया है )

लेकिन भविष्य महापुराण, में बीस हाथ की दूरी पर सहकार (आम) को, सोलह हाथ की दूरी पर आंवला, बकुल और बंजुल को, तथा इसकी दुगुनी दूरी पर सेमर, नागकेसर और पीपल के वृक्ष लगाने का विधान बताया है (4) ।

वृक्षारोपण का महत्व-

भागवत पुराण में कहा है कि वृक्षों को काटना पाप है। वृक्षों को लगाना हितकारी है वृक्षें से सुवृष्टि होती है।यह विज्ञानविदों का कहना है-‘‘वृक्षाणां कर्तनं पापं, वृक्षाणां रोपणं हितम्। सुवृष्टिः जायते वृक्षैः उक्तं विज्ञानवादिभिः। (5) मत्स्य पुराण में कहा गया है कि मनुष्य जितने वृक्षों लगाता है, वह अपनी उतनी पीढियों को तार देता है(6) पद्म पुराण में कहा गया है कि वृक्ष पुत्र पौत्र के समान होतें हैं ‘पुत्रपौत्राभवन्त्येते पादपानात्रसंशयः’ इसलिए वृक्षों को लगाना चाहिए (7)। वृक्ष पुष्पों द्वारा देव, पत्र द्वारा पितृ और छाया द्वारा अतिथि की सन्तुष्ट करते हैं (8)। वृक्ष इस लोक और परलोक में धर्मपुत्र कहे गए हैं ‘‘इहलोकेपरे चैव पुत्रास्तेधर्मतः स्मृतः’(9)

भविष्य पुराण कहता है कि कामनावश एक या दो या तीन पेड अवश्य लगाने चाहिए। मुक्ति की कामना करने वालों को हजारों पेड लगाने चाहिए। पीपल, जामुन, पाकड,आंवला, तेंदू, अनार, अशोक, कदम्ब, महुआ, अर्जुन,बरगद, बकुल, सहकार,सुपारी, आदि पेडों को लगाने के शुभ फलों को बताया गया है।(10)

पीपल पेड लगाने का महत्व

पदम्पुराण, सृष्टि खण्ड अध्याय 24 में कहा गया है कि वृक्ष पुत्रहीन पुरूष को पुत्रवान होने का फल देतें है। पीपल का वृक्ष लगाने पर एक हजार पुत्रों का फल मिलता है। इसी खण्ड में अध्याय 54 या 55 में कहा गया है कि पीपल के समान कोई वृक्ष नहीं है। बेल के आठ, बरगद के सात और नीम के दस वृक्षों को लगाने से जो फल मिलता है वही फल पीपल के एक वृक्ष को लगाने से मिलता है।पीपल को रोपने, रक्षा करने और छूने और पूजने से कृमशः धन, पुत्र, स्वर्ग और मोक्ष मिलता है। जलाशय के समीप पीपल का वृक्ष लगा कर मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है वह सैकडों यज्ञों से भी नहीं मिलता। प्रत्येक पर्व के दिन उसके पत्ते जल में गिरतें हैं, वे पिण्ड के समान होकर पितरों को तृप्त करतें हैं। उस वृक्ष पर रहने वाले पक्षी अपनी इच्छा के अनुसार जो फल खाते हैं उसका ब्राहमण भोजन के समान फल मिलता है। गर्मी के समय गौ देवता ओर ब्राहमण जिस पीपल की छाया में बैठते हैं उसे लगाने वाले मनुष्य को अक्षय स्वर्ग का फल मिलता है अतः सब प्रकार से प्रयत्न करके पीपल का वृक्ष ल्रगाना चाहिए।

भविष्य पुराण में कहा गया है कि ‘इस लोक में वृक्ष पुत्रहीन को पुत्र प्रदान करने की शक्ति देतें हैं इसलिए पीपल लगाने के लिए प्रयत्न करना चाहिए।(11)

वृक्षों की वृद्धि के उपाय

वृक्षों की वृद्धि और उसमें अधिक फूल लाने के लिए प्रायः खाद का प्रयोग हम सभी करतें हैं।अब रसायनिक खादों का प्रचलन बढ गया है। पुराण साहित्य में पेड पौधों में वृद्धि के लिए जो परम्परागत उपाय वर्णित है वह इस प्रकार हैं- अग्निपुराण में कहा गया है कि ‘‘जिन वृक्षों में फल लगने बन्द हो गए हैं उनको कुलथी, उडद, मूंग, तिल, ओर जौ मिले हुए जल से सींचना चाहिए। घृतयुक्त शीतलदूध से सींचने पर वृक्ष सदा फल फूल से युक्त रहतें हैं। मछली वाले जल से सींचने पर वृक्षों की वृद्धि होती है। भेड बकरियों की लेडी का चूर्ण तथा जौ का चूर्ण, तिल और गोबर की खाद को जल के साथ सात दिन तक ढककर रखने के बाद उससे सिंचाई से वृक्षों में फल और पुष्प बढतें हैं। आम के पेडों को शीतल जल से सींचना अच्छा माना गया है। अशोक वृक्ष के लिए कामिनियों के चरण का प्रहार प्रशस्त होता है। खजूर और नारियल के वृक्ष लवणयुक्त जल से सींचे जाने पर बढतें हैं। (12)

वृक्षों की सिंचाई-

अग्निपुराण में कहा गया है कि लगाए हुए वृक्षों को वर्षाकाल में भूमि के सूख जाने पर तथा ग्रीष्म ऋतु में प्रातः और सायं दोनो समय सींचना चाहिए। जबकि शीत ऋतु में मध्याह्न समय पेडों की सिंचाई करना चाहिए।(13)

वृक्ष काटने पर दण्ड व्यवस्था

पीपल बरगद और श्रीवृक्ष को लेष मात्र भी काटना आत्मघाती कहा जाता है।(14) मत्स्य पुराण में कहा गया है कि फलयुक्त वृक्ष काटने पर अपराधी को सुवर्ण का दण्ड देना उचित है। यदि वह वृक्ष किसी सीमा या मार्ग या जलाशय के समीप है तो उसे दोगुना दण्ड दिया जाना चाहिए। फल रहित वृक्ष को भी काटने पर मध्यम साहस का दण्ड (उत्तम साहस का दण्ड एक हजार पण का होता था) देना चाहिए। गुल्मों लताओं तथा वल्लियों को काटने पर एक माशा सुवर्ण का दण्ड देना चाहिए। बिना किसी आवश्यकता के तृण को भी नष्ट करने वाला व्यक्ति एक कार्षापण के दण्ड का भागी होता है। वृक्षादि के काटे जाने पर राजा देश काल के अनुसार उचित मूल्य का दण्ड दे और उस दण्ड को वृक्षादि के स्वामी को दिला दे(15)।

लोक प्रयोजन

आज वन नष्ट हो रहें है, पेडों को काटकर बस्तियां बस रही हं। पर्यावरण सन्तुलन गडबडा गया है। बेमौसम बरसात या सूखा या बाढ या ओजोन परत में क्षय हो, पर्यावरण की  इन समस्याओं से वैश्विक संसार आज जूझ रहा है। वृक्षारोपण को प्रोत्साहन देने, अकारण वृक्षों को न काटने, आदि पर्यावरणीय मूल्य के प्रति जागरूकता के लिए भारत के प्राचीन ज्ञान को उजागर कर नई पीढी में वुक्षारोपण के प्रति संचेतना जागृत करने में भारतीय ज्ञान के ये मोती पथ प्रदर्शक साबित होंगे।

टिप्पणी

1-   ‘इहलोकेपरे चैव पुत्रास्ते धर्मतः स्मृतः’ अर्थात् वृक्ष इस लोक और परलोक में धर्मपुत्र कहे गए हैं।

2-   -‘‘वृक्षाणां कर्तनं पापं, वृक्षाणां रोपणं हितम्। सुवृष्टिः जायते वृक्षैः उक्तं विज्ञानवादिभिः।अर्थात् पेडों को काटना पाप है। पेडों को लगाना हितकारी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि वृक्षों से अच्छी वृष्टि होती है।

सन्दर्भ

(1) अग्निपुराण,अध्याय 282,1

(2) अग्निपुराण, अध्याय, 282,2

(3) अग्निपुराण,अध्याय 282,8-9

(4) भविष्य पुराण, मध्यम पर्व, प्रथम भाग, पूर्त निर्णय नामक दसम अध्याय,83-84

(5) भागवत पुराण, 2,18,9

(6) मत्स्यपुराण,अध्याय 59

(7) पद्मपुराण उत्तरखण्ड,27,14,

(8) पद्मपुराण, उत्तरखण्ड,27,15-16,

(9)  पद्मपुराण, उत्तरखण्ड,27,18

(10) भविष्य पुराण, मध्यम पर्व, प्रथम भाग, पूर्त निर्णय नामक दसम अध्याय, श्लोक 37-38

(11) भविष्य पुराण, मध्यम पर्व, प्रथम भाग, पूर्त निर्णय नामक दसम अध्याय श्लोक 37 

(12) अग्निपुराण,अध्याय 247

(13) अग्निपुराण, अध्याय 247

(14) भविष्य पुराण, मध्यम पर्व, प्रथम भाग, पूर्त निर्णय नामक दशम अध्याय श्लोक 59 

(15) मत्स्य पुराण, 227,91 से 94.

Authored by महिमा गुप्ता, बी.ए. द्वितीय वर्ष, प्रधान अनुसंधानकर्ता (PI)- डॉ. मीनू अग्रवाल, एसोसिएट प्रोफेसर, सदनलाल सांवलदास खन्ना महिला महाविद्यालय, संघटक महाविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज

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