प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में सभा
भूमिका-
सभा और समिति दोनों का वैदिक साहित्य में उल्लेख है अथर्ववेद में एक सूत्र में इन दोनों को प्रजापति की जुड़वा लड़कियां कहा गया है जिससे स्पष्ट होता है कि इन दोनों संस्थाओं को उस समय ईश्वर निर्मित माना जाता था उस समय लोगों का विश्वास था कि यह दोनों संस्थाएं यदि आदिकाल से नहीं तो कम से कम राजनीतिक जीवन के साथ-साथ अस्तित्व में आए थे वैदिक काल में यह संस्थाएं भारत के प्रत्येक गांव में थी उस समय लगभग प्रत्येक राजनीतिज्ञ एवं विद्वान यह महत्वाकांक्षा लेकर चलता था कि समिति द्वारा उसकी योग्यताओं को स्वीकार कर दिया जाए प्राचीन भारतीय राजनीति के प्रायः सभी विद्वान यह मानते हैं कि यहां की राजनीतिक प्रणाली में सभा समिति विदथ परिषद संग्राम आदि का विशेष प्रचलन था वैदिक कालीन शासन प्रणाली का रूप राजतंत्रात्मक होते हुए भी उस समय सभा एवं समिति जैसी लोकप्रिय संस्थाओं का प्रचलन प्रजातांत्रिक विचारों का प्रतीक है कतिपय विद्वानों का मत है कि वैदिक काल में राजा का पद निर्वाचित होता था और उसका निर्वाचन जनता के प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता था अथर्ववेद में अनेक ऐसे जादू टोना का वर्णन है जिनके द्वारा सभा को वाद विवाद में जीता जा सके १
सभा- सभा स +भाग का शाब्दिक अर्थ है चमकना इस अर्थ में सभा वह है जो चमकता है अर्थात इस संस्था के सदस्य प्रतिष्ठित व्यक्ति होते थे दीक्षितार का कहना है की सभा के सदस्य मौलिक रूप से कुलीन ब्राह्मण एवं माधवन हुआ करते थे वास्तव में सभा वृद्ध लोगों की एक परिषद होती थी जिसके सदस्य प्राय कुलीन वंश वाले हुआ करते थे सभा के वृद्ध सदस्यों का चरित्र एवं विद्धता का स्तर इतना उच्च होता था कि सभी समुदाय उनका आदर करते थे सभा के सदस्यों की योग्यता के संबंध में महाभारत की द्रोपदी का यह कथन महत्वपूर्ण है कि वह सभा नहीं जहां वृद्ध न हो वह वृद्ध नहीं जो धर्म के वचन ना बोले वह धर्म नहीं जो सत्य पर आधारित ना हो और वह सत्य नहीं जिसके साथ धोखे का मिश्रण हो सभा एक राष्ट्रीय न्यायपालिका के रूप में कार्य करती थी इसलिए उसके सदस्यों का योग अनुभवी तथा ईमानदार होना आवश्यक था बौद्ध जातकों में कहा गया है की सभा के सदस्य संत एवं श्रेष्ठ व्यक्ति होने चाहिए अथर्ववेद में कुछ इस प्रकार का उल्लेख है कि ज्यों ज्यों सभा की शक्तियां बढ़ती गई इसके सदस्यों के बीच अंतर भी बढ़ते गए इतने पर भी सभा की सदस्यता को निश्चित करने के लिए किसी चुनाव पद्धति को नहीं अपनाया गया यू एन घोषाल ने सभा के दो प्रकार के सदस्यों का उल्लेख किया है सभासद या सभाचार सभा की उच्च श्रेणी के सदस्य हुआ करते थे जो शाही परिषद या न्यायालय के सदस्य भी बन जाते थे अन्य सदस्य सभा या केवल सभासद के ही सदस्य रहते थे वैदिक साहित्य में तीन प्रकार की सभाओं का उल्लेख मिलता है वेदथ सभा और समिति इन तीनों संस्थानों के निश्चित अर्थ के संबंध में भी कुछ कहना कठिन है सभा का अर्थ उस स्थान से है जहां लोग एकत्रित होते थे और समिति उस एकत्रित जन समुदाय को कहा जाता था वैदिक साहित्य में सभा शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में किया गया है किसी भवन जुआ घर अथवा शाही दरबार को इंगित करने के लिए इस शब्द का प्रयोग किया जाता था डॉक्टर जायसवाल के अनुसार सभा का जन्म समिति की भांति ऋग्वेद के अंतिम काल में हुआ तथा इसका जीवन भी समिति के साथ-साथ चल रहा था २
आचार्य बृहस्पति ने चार प्रकार के सभाओं का उल्लेख किया है अचल सभा जो किसी गांव या कस्बे में हुआ करती थी चल सभा जिसके सदस्य विद्वान हुआ करते थे और जो स्थान स्थान पर घूमती रहती थी अधिकार पत्र युक्त समिति जो एक अधीक्षक के प्रधानता में कार्य करती थी और आज्ञानुकूल सभा जिसका प्रधान राजा हुआ करता था ३
सभा शब्द का प्रयोग वेदों एवं ब्राह्मण ग्रंथों में उस मंडली के लिए भी किया गया है जिसमें मिलकर जुआ खेलने वाले लोग अपनी स्त्री तक को भी दाव पर लगा देते थे इस प्रकार सभा का सामाजिक स्वरूप सामने आता है इसमें कभी-कभी गांव के संबंध रखने वाले विषयों पर भी विचार कर लिया जाता था संभावना है कि इस संस्था का संबंध वैदिक काल में भी कहीं राजा से रहा होगा तथा इस प्रकार इसने सामाजिक के स्थान पर राजनीतिक रूप धारण कर लिया होगा अलतेकर के अनुसार अधिकतर प्रमाणों से यही निष्कर्ष निकलता है की सभा प्रायः ग्राम सभा थी और उसमें सामाजिक तथा राजनीतिक दोनों विषयों पर विचार किया जाता था ४ समाज में जाति आधार पर भी सभाएं हुआ करती थी वैदिक काल में विभिन्न वर्गों की ये कम महत्वपूर्ण सभाएं सामाजिक एवं धार्मिक मामलों को तय करती थी चरक संहिता में यह स्वीकार किया गया है कि उस समय दो प्रकार की सभाएं विद्यमान थी प्रथम विद्वान पुरुषों की सभा और द्वितीय साधारण व्यक्तियों की सभा
प्रमाणों के आधार पर या कहा जा सकता है कि कम से कम वैदिक काल में सभा का रूप सार्वजनिक था जिसमें विद्वान एवं सब नागरिक तथा ऐसे ही दूसरे लोग जाया करते थे यह सभा राजनीतिक कार्य करती थी अथवा नहीं और करती भी थी तो क्या करती थी यह स्पष्ट नहीं है कुछ विद्वानों का कहना है कि यह कोई भवन रहा होगा जो विभिन्न उद्देश्यों को पूरा करता होगा प्रारंभ में लोग इस भवन का उपयोग सामाजिक एवं धार्मिक उत्सव मनाने के लिए ही करते होंगे किंतु लोकमत को बनाने तथा मोड सकने की सामर्थ्य रखने के कारण यह राजनीतिक दृष्टि से भी पर्याप्त महत्वपूर्ण थे फिर भी उसे समय के राजनीतिक प्रशासन में सभा का एक व्यवस्थापिका के रूप में कितना और क्या स्तर था यह नहीं कहा जा सकता ५
सभा के कार्य-
सभा के कार्यों के संबंध में यद्यपि निश्चय के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता तथापि कतिपय ग्रन्थों में आए उद्धरणों के सहारे अनुमानानुसार निम्नांकित कार्य किए जाते थे
१-न्यायपालिका संबंधी-
महाभारत में सभा को एक न्यायिक निकाय माना गया है युधिष्ठिर ने दुर्योधन के साथ चौपड़ खेलते हुए अपने आप तक को हरा दिया उसके बाद वह द्रौपदी को भी दाव पर लगाने लगा यह मामला सभा के सम्मुख विचार के लिए प्रस्तुत किया गया जिसकी अध्यक्षता धृतराष्ट्र द्वारा की गई प्रश्न यह था कि क्या युधिष्ठिर द्वारा द्रौपदी को दावों पर लगाया जा सकता था जबकि वह स्वयं अपने को हार कर दास बन चुका था ६ इस प्रश्न की कानूनी आपत्तियों पर पूरी तरह से विचार किया गया तथा सभा के सदस्यों ने स्वतंत्रता एवं निर्भीकता के साथ अपने विचार प्रकट किए परंपरा यह थी कि जब भी कभी सभा के सदस्यों की राय मांगी जाए तो सत्य वादन करना चाहिए कानूनी प्रश्नों पर वाद विवाद करने के बाद धृतराष्ट्र ने पांडवों को दासता से मुक्त करने पर सहमति दे दी सभा की न्यायिक शक्तियां एवं दायित्व पर्याप्त बढ़ते जा रहे थे सभा में महिलाएं भी हो सकती थी
२-कार्यपालिका संबंधी-
सभा के दूसरे कार्य को कार्यकाल का संबंधी कहा जा सकता है इस रूप में वह राजा की एकपरामर्शदात्री निकाय थी राजा सभा के सदस्यों का परामर्श लिए बिना कोई कार्य नहीं कर सकता था सभा के परामर्श के बाद निर्णय लेने का अधिकार स्वयं राजा का था कोई भी राजा सभा के परामर्श की स्वेच्छा चारी रूप से अवहेलना नहीं कर सकता था
३-सेवा संबंधी-
सभा का तीसरा कार्य विश्रामगृह के रूप में सेवाएं प्रदान करना था नल दमयंती ने सभा में विश्राम लिया था इसका उल्लेख महाभारत में आया है आपस्तम्भ धर्म सूत्र में कहा गया है कि राजा को कुछ दूर दक्षिण की ओर सभा का निर्माण करना चाहिए जिसके दरवाजे उत्तर एवं दक्षिण की ओर हो ताकि उसमें से आने-जाने वालों को देखा जा सके सभी स्थानों पर अग्नि जलाई जानी चाहिए तथापि उसमें आहुति दी जानी चाहिए मुख्य हाल में मेहमान को रखा जाए विशेषतः उनको जो कि वेदों के ज्ञाता है इसके प्रदेश में कोई भी ब्राह्मण भूखा ना रहे बीमार ना रहे सर्दी का या गर्मी का कष्ट महसूस ना करें सभा भवन के मध्य में एक क्रीडा स्थल होना चाहिए जो लोग सच्चे और पवित्र हैं यहां खेलने की सुविधा दी जानी चाहिए अस्त्रों का अभ्यास नृत्य गायन संगीत आदि का आयोजन राज कर्मचारियों के घरों पर होना चाहिए ७
निष्कर्ष-
सभा के इस रूप का दर्शन कुछ एक अन्य बौद्ध ग्रंथों में भी प्राप्त होता है एक कथा के अनुसार बोधिसत्व को एक बार यह चिंता हुई कि लड़के पशुओं के बीच एवं हर तरह के वातावरण में खुले मैदाने में खेलते हैं अतः उन्होंने एक हाल बनवाने का निर्णय लिया उस महान आत्मा ने इस निर्णय को क्रियान्वित किया इस हाल के एक भाग में साधारण अजनबियों के लिए जगह थी दूसरे भाग में बेघर के लिए ठहरने का स्थान था अन्य भाग में त्रस्त महिलाओं के लिए जगह थी दूसरे भाग में बौद्ध साधुओं एवं ब्राह्मणों के निवास का प्रबंध था ८ इस हाल में एक अन्य स्थान भी था जहां विदेशी व्यापारी अपना माल दिखा सकते थे इन सभी विभागों के दरवाजे बाहर की ओर खुलती थे उन महात्मा ने न्याय के लिए न्यायालय तथा खेल के लिए भी मैदाने की स्थापना की इस प्रकार वैदिक काल की सभा का यह विचार बौद्ध काल में भी बना रहा किंतु परिस्थितियों के अनुसार इसका रूप बदल गया
संदर्भ ग्रंथ
१- जे एन शिंदे द रिलिजन एंड फिलासफी का अथर्वेद पृष्ठ 75- 76
२-डॉ के पी जायसवाल हिंदू पालिटी पृष्ठ 80
३-बृहस्पति दर्शन
४-प्रोफेसर अलतेकर प्राचीन भारतीय शासन पद्धति पृष्ठ 13
५-बेनी प्रसाद थ्योरी ऑफ गवर्नमेंट इन असिएंट इंडिया
६-रामचंद्र वर्मा हिंदू राजतंत्र खंड एक
७-रतीभान सिंह प्राचीन भारत का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास पृष्ठ 10
८- एम सी बंदोपाध्याय डेवलपमेंट आफ हिंदू पालिटी एंड पॉलीटिकल थिअरी पृष्ठ 9- 10
Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.
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