प्राचीन भारत में गुप्तचर

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भूमिका

    प्राचीन ग्रंथो में गुप्तचर को  चर अथवा चार कहा गया है  I चार की कार्य कुशलता पर राज्य की उन्नति ही नहीं बल्कि उसका अस्तित्व भी अवलंबित होता था I ऋग्वेद में वरुण के चारों पुत्रों का वर्णन मिलता है I वरुण की सर्वदर्शिता उनकी सुचारू क चर व्यवस्था का ही प्रमाण है I कुछ ग्रन्थों में गुप्तचर को दूत कह कर पुकारा गया है I युद्ध के समय गुप्तचर के सैन्य बल एवं युद्ध कला, सज्जा आदि से संबंधित महत्वपूर्ण भेद लेने का कार्य करते हैं I रामायण काल मे गुप्तचर

     रामायण में उल्लेख है कि शुक्र तथा सारेण नाम के राक्षस वानर बेस में राम के शिविर में युद्ध आरंभ होने से पूर्व भेद लेने गए थे १ I राजा अपने चरणों की सूचनाओं के आधार पर अपने दोषों को दूर करने की चेष्टा भी किया करते थे I जैसे रामायण में उल्लेख है कि चरों के प्रतिवेदन पर ही राम ने सीता का परित्याग किया था I

महाभारत काल मे गुप्तचर

      महाभारत के अनुसार शत्रु के 18 तीर्थों और अपने पक्ष में 15 तीर्थों मंत्री, पुरोहित तथा युवराज को छोड़कर के कार्यों का पता ऐसे गुप्तचरों को लगाते रहना चाहिए जो एक दूसरे को ना जानते हो २ I महाभारत में एक स्थान पर वर्णन आया है कि भीष्म के भेदियों ने यहां तक पता लगा लिया था कि राजा द्रुपद ने जिस शिखंडी को पुत्रवत पाला है वह लड़की है, जबकि द्रुपद और उनकी रानी के सिवा किसी को इसका ज्ञान नहीं था ३ I इसलिए गुप्तचर को गूढ़ पुरुष भी कहा जाता है I मनुस्मृति में भी कहा गया है कि राजा को अपनी व शत्रु की शक्ति की पूरी जानकारी अपने चरो द्वारा करते रहना चाहिए ४ I

कामंदकीय नीतिसार में चरों का महत्व

   कामंदकीय नीतिसार में भी चरों के महत्व का वर्णन किया गया है I उसके अनुसार चर राजाओं को दूर तक पहुंचाने वाली आंखें हैं I राजा को उन्हीं के द्वारा देखना चाहिए I जो राजा चरणों की आंखों से नहीं देखा , अज्ञान के कारण समतल भूमि पर भी ठोकर खाता है I क्योंकि ऐसा करने पर वह अंधा कहा जाता है I ऋषित्व जिस प्रकार सूत्रों के अनुसार कर्म करता है उसी प्रकार राजा को चरणों के विचार से कार्य करना चाहिए ५ I

अग्निपुराण में  चरों का महत्व

  अग्निपुराण में भी राजा को चर चक्षु कहा गया है I राजा जब सो जाता है तब उसके गुप्तचर रूपी चक्षु, दूर और पास की सभी घटनाओं को देखते रहते हैं I राजनीति शास्त्र के अधिकांश ग्रन्थों में गुप्तचरों की आवश्यकता और उसके महत्व का वर्णन मिलता है I

महर्षि वेदव्यास के अनुसार चरों का महत्व

महर्षि वेदव्यास का कहना है कि राष्ट्र के भीतरी और वाह्य सभी समाचारों को भली भांति जानकर ही राजा का कोई कार्य करना चाहिए ६ I एक ही कार्य के लिए तीन-तीन गुप्त चरों की नियुक्ति की जानी चाहिए I वह आपस में एक दूसरे को ना जानते हों I उनके भी प्रतिवेदनों को जांच करके कार्य करना चाहिए ७ I

कालिदास के अनुसार चरों का महत्व

  कालिदास ने गुप्त चरों को प्रकाश की किरणें कहा है I अतः उनके कारण शत्रु राजाओं की गतिविधियां अदृश्य नहीं रह सकती ८ Iबिना गुप्तचर के राज्य प्रशासन का संचालन ठीक प्रकार से नहीं होता I भारवी का कहना है कि राजा को चाहिए कि उत्तम चरित्र वाले विश्वासी और उन्नति करने वाले गुप्त चरों द्वारा शत्रुओं के सभी व्यापारियों को जान ले ९ I प्राचीन ग्रंथकारों ने शत्रु राज्य की गतिविधियों को जानने के लिए ही गुप्तचर नियुक्त करने का निर्देश नहीं दिया है I अपितु उनका यह कर्तव्य भी निर्धारित किया है कि अपने राज्य का कोई भेद शत्रु को पता ना चल सके तथा अपने राज्य में विदेशी गुप्तचर को पकड़वाकर दंडित करवाये I

शुक्राचार्य के अनुसार चरों का महत्व

   शुक्राचार्य के अनुसार जो राजा के द्वारा दूसरों के देशों का निरीक्षण करने के लिए नियुक्त किए जाने पर पता लगाकर राजा को सूचित करता है उसे सूचक कहते हैं १० I आचार्य के इस कथन से लगता है कि वह गुप्तचरों के माध्यम से सब पर खुफिया नजर रखने के पक्ष में हैं I महर्षि शुक्र ने गुप्तचर के महत्व को प्रतिपादित करते हुए लिखा है कि वह शत्रु और प्रजा व राज कर्मचारियों के व्यवहार की छानबीन करके राजा को वस्तु स्थिति से अवगत कराते हैं ११  ताकि, राजा राज्य को सुचारू रूप से चला सके I किसी भी राज्य की सफलता शत्रु से सुरक्षा और प्रजा व कर्मचारियों की कर्तव्य परायणताऔर राज्य के प्रति निष्ठा पर निर्भर करती है I गुप्तचर अपनी कुशलता से शत्रुओं में बैठ करके उसकी शक्ति योजना आदि का पता करके अपने राज्य की सहायता करते हैं I राजा गुप्तचर से प्राप्त सूचना के आधार पर अपनी रणनीति बनाकर विजय प्राप्त कर सकता है I शुक्राचार्य ने गुप्तचर के महत्व को स्वीकार करते हुए प्रकृति, मंत्री आदि और अधिकारी वर्ग से उसकी सुरक्षा करने का प्रावधान किया है १२ I

आचार्य कौटिल्य के अनुसार चरों का महत्व

आचार्य कौटिल्य ने राजनीतिक समस्याओं के समाधान के लिए गुप्तचर व्यवस्था को राज्य के लिए आवश्यक बताया है I उन्होंने राजा की रक्षा के लिए चरों का उपयोग करने पर बल दिया है I उनका मत है कि पर राज्य से ही राजा पर संकट की संभावना नहीं रहती वरन स्वराज की अभक्त प्रजाओं, मंत्रियों, बंधुओं ,राजकुमारों, और रानियों आदि से भी खतरा रहता है I कौटिल्य अर्थशास्त्र में राजा पर स्वजनो के घातों के कितने ही उदाहरण दिए गए हैं १३ I इसलिए कौटिल्य ने स्वजनों पर दृष्टि रखने के लिए चरों की व्यवस्था की है उनका कहना है कि जब राज पुत्रों आदि के राजा विरोधी भाव देखे जाएं तब पहले तो उन्हें भेदियों व अन्य राज्य परिवारों द्वारा राजा के अनुकूल करने के प्रयत्न किए जाएं किंतु, जब इस प्रकार का उपाय निष्फल हो जाए तो राज्य के कल्याणार्थ गुढ़ पुरुषों द्वारा उसका वध कर दिया जाए १४ I

 कामंदक  के अनुसार चरों का महत्व

   गुप्तचरों को सच्चरित्र, विश्वासी और राजा का आज्ञाकारी होना चाहिए १५ I कामंदक का कथन है कि गुप्तचरों को दूसरों की बातों को और मन के अंदर निहित तत्वों को जानने में समर्थ होना चाहिए I वह संकेत को समझने वाले ,स्मृतिशाली , मधुरभाषी  ,शीघ्रगामी ,विपत्तियां तथा कठिन परिस्थितियों को झेलने में समर्थ, क्षिप्रकारी ,और प्रत्युत्पन्नमति हो १६  विशाखदत्त ने गुप्तचर की योग्यता का विशद वर्णन किया है I यह वर्णन चाणक्य के अर्थशास्त्र के अनुरूप है I

निष्कर्ष-

    गुप्तचर को कुलीन, राजभक्त, विश्वसनीय, वेश आदि बदलने में चतुर, विभिन्न देशों की भाषा, वेश, रीति रिवाज, मार्ग आदि को जानने में  चतुर, विविध कलाओं में पारंगत ,तथा अपने पक्ष में विचारों को जानने समझने में कुशल होना चाहिए १७ I गुप्तचर को चाहिए कि वह वस्तु स्थिति को ठीक-ठाक प्रकार से समझ सके तीव्र बुद्धि हो और स्वामी भक्त हो राजा भी उसको प्रचुर धन दे तथा उसका आदर सम्मान करें १८ I राजा का यह कर्तव्य है कि समय-समय पर गुप्तचर के कार्यों की और स्वामी भक्ति की परीक्षा करता रहे I परीक्षा में उत्तीर्ण होकर गुप्तचरों को उपधाविशुद्ध कहा गया है १९I

संदर्भ ग्रंथ

१-हिंदू राजशास्त्र- अंबिका प्रसाद वाजपेई- पृष्ठ- 306

२-महाभारत, सभापर्व -5.38

३-हिंदू राजशास्त्र- अंबिका प्रसाद वाजपेई- पृष्ठ- 314

४-मनुस्मृति -9.28

५- कामंदकीय नीतिसार -13.31 एवं 34

६-महाभारत शांतिपर्व- 86.19

७-महाभारत, सभापर्व -5.38

८-रघुवंश- 17.48

९-किरातार्जुनीयम् -1.20

१०-शुक्र नीतिसार -स्वामी जगदीश्वरानंद- 2.182

११-शुक्रनीति में राजनीतिक विचार व संस्थाएं -डॉक्टर पद्मनाभ शर्मा- पृष्ठ 88

१२-कॉटिलयम अर्थशास्त्रम- 1.10

१३-कौटिल्य अर्थशास्त्र- 1.19

१४-कौटिल्य अर्थशास्त्र- 1.17

१५-किरातार्जुनीयम् -1.2

१६- कामंदक नीतिसार -12.25

१७-मुद्राराक्षस- प्रथम अंक

१८-वेणी संहार -222-224

१९- कौमुदी महोत्सव -पृष्ठ 28

Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.

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