प्राचीन भारत में राज्य के अंग एवं उसका महत्व

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भूमिका

प्राचीन राजनीतिक व्यवस्था में राज्य की उत्पत्ति हमेशा ही जब राजनीतिक व्यवस्था भंग होने की स्थिति में होती है तभी यह महसूस किया जाता है कि इस समय एक ऐसी सर्वोच्च शक्ति की आवश्यकता है जो सामाजिक एकरूपता एवं शांति की स्थापना कर सके I

महाभारत में राज्य के अंग

महाभारत में राज्य को सात अंगों वाला बताया गया है I आत्मा, अमात्य, कोष, दंड, मित्र, जनपद, पुर, (१) I परंतु महाभारत में राज्यागों में वर्णित क्रम में भिन्नता दिखाई देती है महाभारत में ही एक अन्य स्थान पर राज्यागों का वर्णन इस क्रम में मिलता है –अमात्य, राष्ट्र, पुर, कोष, बल, मित्र , तथा स्वामी (२) I

शुक्रनीति में राज्य के अंग

शुक्र  ने राज्य के सप्तांगों का वर्णन करते हुए कहा है कि स्वामी, अमात्य, सुहच्त ,पुर ,राष्ट्र ,कोष, दंड (३)I

मनुस्मृति में राज्य के अंग

मनु ने राज्य के सप्तांगों का उल्लेख इस प्रकार किया है- स्वामी, अमात्य ,सुहृद, पुर, राष्ट्र ,कोष, और दंड (४) I

अर्थशास्त्र में राज्य के अंग

कौटिल्य ने भी राज्य के सात अंग बताए हैं – स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दंड, और मित्र( ५) I प्राचीन भारतीय चिंतन के साहित्य में ऐसे उदाहरण बहुतायत मात्रा में पाए जाते हैं जो इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि भारत में राज्य सात अंगों में विभाजित थी ,एवं कौटिल्य इस विचारधारा के प्रबल समर्थक थेI

वैदिक साहित्य में राज्य के अंग

वैदिक साहित्य में राज्य के सात अंगों का उल्लेख तो नहीं प्राप्त होता परंतु ऋग्वेद में संपूर्ण विश्व की कल्पना विराट पुरुष के रूप में की गई है I उस विराट पुरुष के विभिन्न अवयवों से सृष्टि की रचना का वर्णन मिलता है( ६) I यजुर्वेद में भी कुछ इसी तरह की मिलती-जुलती व्याख्या की गई है (७) I यजुर्वेद में ही अन्यत्र राज्य के अंगों की समानता पुरुष के अंगों से की गई है (८) I भारतीय विद्वानों ने राज्य के तत्वों को अंग या प्रकृति कहा है I

   दीक्षितार के मतानुसार भारतीय राजनीतिक साहित्य में प्रकृति एक प्राविधिक शब्द है, जिसका प्रयोग विभिन्न अर्थों में हुआ है यथा मंत्रीगण ,प्रजाजन, युद्ध में प्रभु और राज्य के आवश्यक अंग (९) I महाभारत में स्पष्ट किया गया है कि राज्य के अंगों में आपसी सहयोग से ही प्रजा की सुरक्षा एवं लोक कल्याण की प्राप्ति की जा सकती है I राज्य के अंगों की विशेषता का उल्लेख इसमें किया गया है (१०)I राज्य के आंगिक रूप के अनुसार राज्य के अंगों का आपसी सहयोग राज्य के स्थाई अस्तित्व के लिए नितांत महत्वपूर्ण है I राज्य का कार्य सुचारू रूप से तभी संपादित हो सकता है, जब सभी अंग मिलकर उसे सहयोग प्रदान करेंगे (११) I

राज्य के अंग का महत्व

मनु ने कहा है कि राज्य के अंगों के आपसी सहयोग से राज्य उसी प्रकार स्थायित्व प्रदान प्राप्त कर सकता है जिस प्रकार तीन स्तंभ एक दूसरे के सहारे स्थित रहते हैं (१२) I महत्व के दृष्टिकोण से मनु राज्य के इस प्रत्येक अंग को बराबर मानते हैं जिस अंग से जो कार्य सिद्ध होता है वह उसी में श्रेष्ठ माना गया है (१३) I अपने प्रकृति के अनुसार सातों अंगों का महत्वपूर्ण स्थान है लेकिन राजा को अपेक्षाकृत अधिक महत्व दिया गया है I इसी कारण राजा को मूल अथवा शीर्ष कहा गया है (१४) I कौटिल्य की राय में राजा सभी अंगों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है I यदि राजा यथेष्ट गुणों से संपन्न है तो वह अन्य अंगों को उस गुणों से संपन्न बना सकता है, परंतु यदि वांछित योग्यताओं से रहित हुआ तो अन्य अंगों के गुणों से किसी भी अर्थ की सिद्धि नहीं होगी (१५) I कौटिल्य ने संक्षेप में राजा को राज्य कह दिया है (१६) Iराजसत्ता को ऐसा सर्वोच्च महत्व दिया जाना प्राचीन भारत की राजतंत्र शासन पद्धति की ओर विशेष कर कौटिल्य के प्रबल राजतंत्र रूप की अपनी खास विशेषता है I

शासन सत्ता का विकास

शासन सत्ता का क्रमशः विकास कैसे हो गया इसका विवेचन वैदिक प्रमाणों के परामर्श से मिलता है कि उस जमाने में जन राज्यों की प्रायः रूढ़ि थी I यदु ,तुर्वश ,भरत आदि जिन जनों का उल्लेख अनेक बार वेदों में मिलता है उनका कोई निश्चित प्रदेश नहीं था I वे लोग भ्रमणशील थे अतः उनके राज्य भी उनके साथ बदला करते थे , पर उत्तर वैदिक काल में देश के विभिन्न भागों में बस चुके थे ( १७) और उनके राजा जन के ही नहीं राष्ट्र यानी प्रदेश के सभी स्वामी कहे जाने लगे थे (१८) I मगर पर्याप्त सामग्री ना होने से हम यह नहीं जान सकते कि किन राज्यों का क्रमिक विकास होकर प्रादेशिक राज्य कैसे बना I

उत्तर वैदिक काल

में सम्राट का राज्य क्षेत्र ससागर पृथ्वी कहा गया, जिसमें प्रादेशिक राज्य के पूर्ण विकास का प्रमाण मिल जाता है Iप्रादेशिक राज्य का संबंध किस प्रकार रहता था यह प्रश्न महत्वपूर्ण है I वैदिक काल वांग्मय में इस विषय का उल्लेख भी नहीं मिलता है परंतु जब ई पू चौथी सदी में राजनीतिक विचारों का विकास होने लगा तब से इस विषय की चर्चा मिलती है I कौटिल्य और  मनु दोनों का मत है कि राज्य एक सजीव एकात्मक शासन संस्था है I मनमानी चाल चलने वाले अपना ही भला देखने वाले , विभिन्न कणो का ढीला- ढ़ाला जोड़ नहीं है I इसके मतानुसार स्वामी, अमात्य, भू प्रदेश, कर या साधन सामग्री ,दुर्ग, सेना, और मित्र राज्य के सात महत्वपूर्ण अंग है I जिसको शब्द प्रकृतियाँ कहते हैं (२०) I

कामंदक, शुक्र आदि परवर्ती लेखक

सप्तांग परिभाषा को स्वयं सिद्ध मानते हैं और शिलालेख आदि में वर्णित राज्य की इन्हीं सात प्रकृतियों से युक्त पाए जाते हैं (२१) I प्राचीन भारतीय विचारक इन सप्त- प्रकृतियों को राज्य इनमें से कुछ संग दूसरों की अपेक्षा अधिक महत्व के हो सकते हैं, जैसे- दुर्ग और मित्र के मुकाबले ,स्वामी और अमात्य (२२) I परंतु अपने में कम महत्व का होते हुए भी प्रत्येक अंग राज्य शरीर के लिए एक से अनिवार्य थे , क्योंकि एक अंग का अभाव दूसरा नहीं पूरा कर सकता (२३) I राज्य का अस्तित्व तभी कायम रह सकता है और उसका कार्य तभी ठीक चल सकता है जब उसके सब अंग एक से जुड़कर और एक विचार से काम करें (२४) I

कौटिल्य

ने इस प्रश्न पर भी गंभीरता पूर्वक विचार किया है कि इन प्रकृतियों , राज्य के अंगों में किसका महत्व अधिक है I पुराने आचार्यों का मत था कि स्वामी , अमात्य , जनपद ,दुर्ग ,कोष, दंड और मित्र में पहला अधिक महत्व का है I स्वामी अमात्य से अधिक महत्व का है और अमात्य जनपद से अधिक महत्व रखता है (२५) I पर आचार्य भारद्वाज ने इस मत का यह कहकर खंडन किया है कि स्वामी की अपेक्षा अमात्य का अधिक महत्व है क्योंकि मंत्र, राजकीय विचार- विमर्श ,फल की प्राप्ति, राजकीय कर्म का अनुष्ठान, आय - व्यय का विवेचन, दंड का प्रयोग, शत्रु और आटविको का निवारण, राज्य की रक्षा, आपत्तियों का प्रतिकार, राजकुमारों का आरक्षण, और अभिषेक आदि सब कार्य अमात्यों द्वारा किए जाते हैं पर कौटिल्य मध्य की तुलना में राजा को ही अधिक महत्व का मानते हैं I

   उनका मत था कि मंत्री ,पुरोहित आदि राज कर्मचारी वर्ग को राजा ही नियुक्त करता है I यदि स्वामी संपन्न हो तो अन्य  प्रकृतियां भी उत्थानशील होती हैं I यदि वह प्रभारी हो तो अन्य सभी उसी के सदस्य हो जाते हैं अन्य प्रकृतियों के संबंध में भी इसी प्रकार से विवेचन करके कौटिल्य ने यही मत प्रतिपादित किया है कि राजा आदि सातों अंगों मैं पहले प्रकृति ही अधिक महत्व की होती है (२६)I

   यद्यपि कौटिल्य ने राज्य संस्था की सातों प्रकृतियों को स्वीकार किया है पर उसकी दृष्टि में राजा और राज्य दो प्रकृतियां ही प्रधान हैं I मौर्य के विशाल साम्राज्य में राजा  स्थानीय था I अतः उसकी महत्ता आदि अन्य प्रकृतियों की तुलना में अवश्य ही अधिक थी I इसी कारण उन्होंने राजा और राज्य को ही प्रधान माना है राज्य में जनपद, पूर, सेना, कोष आदि का समावेश हो जाता है और राजा इसकी शासन शक्ति का प्रतीक होता है I अतः राजा और राज्य कह देने से संपूर्ण राज्य संस्था का बोध हो सकता हैI

निष्कर्ष

अतः स्पष्ट है कि प्राचीन भारतीय विचारक राज्य को एक संजीव संहिता मानते थे I अवश्य ही वे राजा और शासन व्यवस्था को इस शरीर के सबसे श्रेष्ठ अंग मानते थे पर कम महत्व के होते हुए भीअन्य अंग राज्य शरीर के लिए उतने ही आवश्यक थे I इसके साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि राज्य शरीर और प्राकृतिक शरीर की क्षमता पूरी पूरी हो सकती है I शरीर के विभिन्न पिंड और अवयव अलग से नहीं जीवित रह सकते पर राज्य कुछ अंग जैसे- दुर्ग और कोष अलग भी रह सकते हैं और उसकी सहायता से नए राज्य की रचना भी की जा सकती है I

संदर्भ ग्रंथ

१-आत्मामात्याश्य कोषाच्य दण्डों मित्राणि वैवहिं जनपदाश्चैव पुरं च कुरुनन्दन: I ( शा प  69.64 )

२- मा. नु. प.  145, पृष्ठ 59 .48

३-शुक्र 1.6

४-मनु 9.294

५-अथर्व 6.1.1

६- ऋग्वेद 11 .9. 12

७-यजुर्वेद 31.12

८-यजुर्वेद 31.13

९-परमात्माशरण , प्राचीन भारत में राजनीतिक विचार व संस्थाएं, पृष्ठ -315 पर उद्धृत

१०- म . अनु. प. पृ।- 594, 145 .8-9

११- कामन्दक 4.1-2

१२-सप्तांग राजस्य विष्टव्धस्य त्रिदण्डवत (मनु 9.296)

१३-वही 9.296

१४-यत्र  मूह्ना नृप स्मृतः ( शुक्र 1.61 )

१५-अ. पु. (आनंद आश्रम संस्कृत सीरीज 241 -28 )

१६-राजा राज्यमिति प्रकृति संक्षेप (अर्थ 8.2 )

१७ ऐ. ब्रा. 8.3.14

१८- ते.स.  2.3 , 3 - 4

१९- ऐ. ब्रा. 7.3.14

२०-इन सप्त प्रकृतियों में से स्वामी, अमात्य, रत्नी या उच्चाधिकारी ,पूर, और बलि आदि का उल्लेख वेदों में भी मिलता है परंतु उसके परस्पर और राज्य के प्रति संबंध की व्याख्या यहां नहीं है I

२१-ए. का. भा . 5, चन्नरापद्ण न. 148,50 स.- 1183

२२-मानव शरीर में कुछ अंग जैसे नेत्र या मस्तिष्क दूसरे अंग से जैसे हाथ या जाघं से अधिक महत्व के   रहते हैं I

२३-मनु 9.297

२४- कामंदक 4.1 – अर्थशास्त्र -6 / 1

२५-कौटिल्य अर्थशास्त्र- 8/ 1  ----२६-वही

Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.

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