मनुस्मृति में राजकोष तथा करारोपण

From enIKSwiki
Jump to navigation Jump to search

मनुस्मृति में राजकोष  

मनुस्मृति में मनु ने राजा को निर्देश दिया है कि वह प्रतिदिन कोष की आय तथा व्यय का निरीक्षण करें I मनु ने कोष संग्रह हेतु आय के विभिन्न साधनों का उल्लेख किया है I मनु ने राजकोष को राजा की निजी संपत्ति नहीं माना है I अपितु राजकोष प्रजापालन का प्रमुख साधन है I अतः मनु ने राजकोष की वृद्धि के लिए प्रजा शोषण का पूर्ण निषेध किया है  I उनका मत है कि राजा को प्रजा पालन के लिए ही करो द्वारा धन संग्रह करना चाहिए I

कर सिद्धांत 

मनु ने प्रजापालन के दायित्व एवं अन्य कार्यों की पूर्ति के लिए राजा को कर लगाने का अधिकार दिया है, किंतु इसके साथ ही साथ राजा को कर लगाने तथा वसूलने में निम्न सिद्धांतों का पालन करना चाहिए -स

१-मनु के अनुसार राजा को कर आदि को नियंत्रित तथा दंडित नहीं करता है किंतु प्रजा से कर बली आदि प्राप्त करता है I उसे राजा के प्रजाजन दुखी होकर विद्रोह कर देते हैं और उसे राजा की राजशक्ति का पतन हो जाता है I किंतु जब राजा प्रजा की रक्षा करते हुए कर वसूलत है तो उसका राज्य सीचें गए वृक्ष की भांति लगातार बढ़ता रहता है १ I संक्षेप में राजा को प्रजा की रक्षा करते हुए ही कर वसुल ने का कार्य करना चाहिए I यदि वह प्रजा की रक्षा संबंधी अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता है तो वह प्रजा से कर वसूलने के अधिकार से भी वंचित रहता है I

२-राजा को कभी भी प्रजाजन पर अधिक मात्रा में कर नहीं लगना चाहिए I क्योंकि अधिक कर लगाने की नीति आरंभ में प्रजा की समृद्धि का नाश करती है I और अंत में स्वयं राजा का विनाश का कारण बनती है I इससे प्रजापक्ष एवं राज पक्ष दोनों की ही हानि होती है  I मनु के अनुसार राजा को व्यापारियों से निर्धारित मात्रा में ही कर लेना चाहिए  I जो राजा अति लोभ से अन्यों के सुख को नष्ट करता है वह वास्तव में उसके साथ ही अपनी सुख का भी नाश करता है २ I

३-राजा को राज्य की कृषि एवं व्यापार की उन्नति करने के लिए कर के रूप में धन का संग्रह करना चाहिए I इस प्रकार करारोपण का उद्देश्य एवं आधार मात्र राजकोष में धन की वृद्धि नहीं अपितु संपूर्ण राष्ट्र की समृद्धि है I राजा को राज्य कर्मचारी वर्ग तथा प्रजा जन तीनों के सुख में वृद्धि का विचार करके ही कर लगाना चाहिए ३ I

४-राजा को कर देना ऐसा कार्य है जो प्रजा जन को व्यथापूर्ण लगता है I अतः मनु का निर्देश है कि राजा को कर इस प्रकार लगाने तथा वसूलने चाहिए की प्रजाजन कष्ट का अनुभव नहीं करें  I संक्षेप में राजा की संपूर्ण कर प्रणाली इस प्रकार की होनी चाहिए की प्रजा जन सहज भाव से कर दे ४ I

५-मनु के अनुसार राजा को किसी वस्तु या सामग्री के कुल लागत मूल्य पर कर नहीं लगना चाहिए I अपितु वास्तु के व्यापार पर हुए लाभ पर ही कर लगाना चाहिए I मनुस्मृति का निर्देश है कि क्रय विक्रय मार्ग में भोजन तथा भरण पोषण आदि व्यय को ध्यान में रखकर व्यापारियों पर कर लगाना चाहिए ५  Iइस नियम का पालन करने पर व्यापारियों की कर देने की क्षमता में लगातार वृद्धि होती है और इस प्रकार राजकोष की वृद्धि के अवसर भी बने रहते हैं  I

कर के प्रकार

मनुस्मृति ने अनेक प्रकार के कर का उल्लेख किया है जिनमें कुछ प्रमुख हैं-

१- बली कर -मनुस्मृति के अनुसार बली कर ६ ग्राम वासियों पर लगाया जाता था  I और इन्हें प्रतिमाह अथवा वर्ष में एक बार एकत्रित करके राजकोष में जमा किया जाता था  I ग्राम में उत्पन्न धन ,अन्न ,धान्य ,पान ,चारा ,ईंधन, आदि का छठा भाग ग्राम वासियों से ग्राम के अधिकारियों द्वारा एकत्रित करके राजकोष में संचय हेतु भेजा जाता था I इस प्रकार बली वस्तु रूप में संग्रहित कर था I मनु के अनुसार राजा बलि के रूप में कर ग्रहण करने का औचित्य तभी स्वीकार जाता है जब वह प्रजा की रक्षा इस प्रकार करता है जैसे पिता पुत्र की रक्षा करता है ७ I

२- अर्थ दंड- मनु ने दंड के 10 स्थान बताएं हैं जिनमें से एक स्थान अर्थ दंड भी है ८ और अर्थ दण्ड विभिन्न अपराधियों से प्राप्त जुर्माना है I जिसे राजकोष में जमा किया जाता है I मनु के अनुसार अर्थ दंड के रूप में प्राप्त राशि का प्रयोग भी प्रजा आरक्षण के लिए किया जाना चाहिए  I उन्होंने विभिन्न अपराधों के लिए अर्थ दंड की विभिन्न मात्राएं बताएं हैं ९ I

३-शुल्क- शुल्क ऐसा कर है जो उन व्यक्ति व्यापारिक वस्तुओं अथवा सामग्री पर लगाया जाता था जो बाजार में व्यापारियों द्वारा बेची जाती थी I यह कर आधुनिक युग की चुंगी कर से बहुत समानता रखता है I यह कर व्यापारियों को प्राप्त लाभ के बीच में भाग के रूप में वसूला जाता था १०  Iराज्य की सीमा पर तथा विभिन्न नगरों या बाजारों को जाने वाले मार्गों पर ऐसी चौकिया होती हैं जहां व्यापारियों से शुल्क ग्रहण किया जाता था  I यह नियम था कि यदि कोई व्यापारी विभिन्न रूपों में शुल्क चोरी करता था तो उसके द्वारा चोरी किए गए कर की कुल मात्रा के 8 गुना अधिक मात्रा में उसे दंड के रूप में धन वसूला जाता था ११  I यदि कोई व्यापारी राजा द्वारा प्रतिबंधित सामग्री को बेचता था तो उसका सर्वत्र हरण किया जा सकता था १२

धन संग्रह के साधन 

मनु ने धन संग्रह के ऐसे साधनों का भी उल्लेख किया है जिन्हें उन्होंने प्रत्यक्ष एवं स्पष्ट रूप से कर का नाम दिया है I व्यापार की उन्नति एवं नागरिकों की सुविधा के लिए राज्य नदी ,नालों ,आदि को पार करने के लिए  पूलों ,नालों ,डोगियों आदि की व्यवस्था करता है I और इन पर होने वाले व्यय की पूर्ति के लिए संतरणकर लगता था  I राजा द्वारा नियुक्त मल्लाह संतरण कर वसूल सकते थे  I और इसके एक अंश को राजकोष में जमा करते थे I

     मनु ने पुल अथवा नौका से नदी पार करने वाले सामान रहित व्यक्तियों सामान्य युक्त व्यक्तियों स्त्रियों खाली वाहनों भार्युक्त वाहनों विभिन्न पशुओं आदि पर लगने वाले संतरण कर की राशि बताई है १३ I उनके अनुसार दरिद्र व्यक्ति से कुछ कम संतरण कर लेना चाहिए और दो माह से ऊपर की गर्भिणी स्त्री ,सन्यासी, वानप्रस्थ ,ब्राह्मण ,व ब्रह्मचारी से कोई कर नहीं लिया जाना चाहिए १४ I

      पशुकर पशुओं के व्यापारियों से प्राप्त किया जाता था I उन्हें पशुओं की बिक्री से प्राप्त लाभ का 50 वां हिस्सा राजा को पशु कर के रूप में देना होता था १५ I यह उल्लेखनीय है कि शांति पर्व ने भी इसी रूप में पशु कर का वर्णन किया है १६ I

निष्कर्ष

मनु ने श्रमिकों तथा शिल्पियों पर भी कर लगाने का निर्देश दिया है किंतु यह कर वस्तु अथवा धन के रूप में नहीं है I अपितु उनसे प्राप्त निशुल्क सेवा के रूप में है राजा श्रमिकों शूद्रों तथा लोहार बधाई आदि से शिल्पियों से प्राप्त माह में एक दिन निशुल्क काम कर सकता है १७ I और यही उनसे सेवा रूप में प्राप्त कर है  I मनु ने आकर कर का भी उल्लेख किया है राजा को प्रजा से स्वर्ण के लाभ का 50 वां भाग कर के रूप में प्राप्त करके राजकोष की वृद्धि करनी चाहिए १८  

संदर्भित ग्रंथ

१-मनुस्मृति- 8.54

२-मनुस्मृति- 7.128

३-मनुस्मृति -7. 137-139

४-इस संबंध में मनु का प्रसिद्ध कथन है जैसे जोक बछड़ा और भंवरा थोड़ा-थोड़ा भाग्य पदार्थ ग्रहण करते हैं वैसे ही राजा प्रजा से थोड़ा-थोड़ा वार्षिक कर ले I

५-मनु -7.127

६-बली का अर्थ है भोजन या अन्न से यज्ञ हेतु ईश्वर हेतु निकाला गया भाग - जैसे -बली बैश्वदेव यज्ञ में भोजन का कुछ अंश अन्य प्राणियों के लिए निकाल कर रखा जाता था I  वैसे ही प्रजाजन राजा को अपनी उपज आदि के छठे भाग को दे ताकि वह संपूर्ण राष्ट्र का पालन कर सके I

७-मनुस्मृति - 7.80 दृष्टव्य –मनु- 8.308- 9.254

८-मनुस्मृति के अनुसार अपराधी को दंड देने के लिए अग्र लिखित 10 स्थान लिंग ,उदर ,जीभ, हाथ, पांव, नेत्र, कान ,नाक, शरीर ,तथा धन है- मनुस्मृति -8.125

९-अर्थ दंड के योग्य प्रमुख अपराध अग्र लिखित हैं I  विभिन्न कर्म से झूठी गवाही देना, प्रतिज्ञा करके उसे नहीं निभाना ,चरवाहे द्वारा पशुओं से खेत को चराना ,या नष्ट करना ,अपशब्द कहना ,या अपमान करना I

१०-मनुस्मृति-8.398

११-मनुस्मृति- 8.400

१२-मनुस्मृति- 8.399

१३-मनुस्मृति -8.404

१४-मनुस्मृति -8.405 -406

१५-मनुस्मृति -7.130

१६-शांति पर्व- 6-7.23-24

१७-मनुस्मृति -7.138

१८-मनुस्मृति- 7.130

Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.

Published by,