महाभारत में प्रशासन तथा परराष्ट्र नीति

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भूमिका- 

आंतरिक शासन व्यवस्था का महाभारत में अर्थशास्त्र के समान स्पष्ट विवरण नहीं मिलता I स्फूट उदाहरण से इसके स्वरूप का कुछ परिचय प्राप्त होता है I ऐसा प्रतीत होता है कि उस काल में देश अनेक राज्यों में विभक्त था I राज्य के लिए राष्ट्र जनपद तथा विशेष शब्द प्रयुक्त किए गए हैं I सामान्यतः राज्य में दो प्रकार के प्रदेश होते थे I एक जिस पर राजा का पूर्ण अधिकार रहता था और दूसरा जो समांत शासको के अधीन थे I

आंतरिक शासन- 

शासन की सुविधा के लिए राज्य ग्राम नगर और प्रान्तो में विभाजित था I १ शासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी I उसके ऊपर क्रमशः 10 -20 शत तथा सहस्त्र ग्रामों के समूह की इकाइयां होती थी I सहस्त्र ग्राम सबसे बड़ी इकाई थी I महाभारत में तो यह स्पष्ट नहीं है पर संभवतः प्रान्तों के अंतर्गत अपने शासन के केंद्र थे I इन इकाइयों की शासन व्यवस्था का उल्लेख मिलता है I ग्राम शासन का प्रमुख अधिकारी ग्रामिक था I उसे गांव संबंधी सभी विषयों का प्रबंध तथा अपराध आदि का पता रखना या लगाना होता था I अपने क्षेत्र के सभी विवरण उसे अपने से उच्च 10 ग्राम के अधिकारी को देने पढ़ते थे I इस प्रकार दशप विशंत्यपति को विशंत्यपति शतग्रामा धिकारी को और शतग्रामाध्यक्ष सहस्राग्रमपति को अपने-अपने क्षेत्र से संबंधित सभी शासन तथा न्याय संबंधी सूचनाएं देते थे और महत्वपूर्ण कार्यों में उसके आदेश के अनुसार कार्य करते थे I २ सहस्ग्रामधिप राजा के नियंत्रण में कार्य करता था ३ I यह सभी प्रादेशिक अधिकारी सचिव के निर्देशन में कार्य करते थे ४ I शत ग्रामों की इकाई कदाचित शासन का नियंत्रण केंद्र होता था I उल्लेख है कि ग्रामों में से एक धन-धान्य संपन्न गांव का प्रबंध राजा के अधीनस्थ अनेक अधिपतियों के अधिकार में होना चाहिए I इन विभिन्न ग्रामाधिपतियों पर अपने क्षेत्र में कर संग्रह युद्ध संबंधी तथा व्यवस्था संबंधी कार्य के करने का दायित्व था ५ I

राज्यों में ग्रामों के साथ बड़े तथा छोटे नगर भी थे I उनके शासन प्रबंध का भी महाभारत में विवरण मिलता है I नगरों के शासन का अधिकारी सर्वार्थ चिंतक कहलाता था I इस अधिकारी के अतिरिक्त एक नगर सभा भी होती थी I गुप्तचर तथा सभासदों की सहायता से सवार्थ चिंतक नगर का शासन करता था I उसके अधीनस्थ अन्य कई अधिकारी होते थे जिनके कार्यों का नियंत्रण तथा उसकी दुर्नीति से प्रजा की रक्षा करना उसका कर्तव्य था I केंद्रीय शासन राजा मंत्रियों की सहायता से करता था I राज्य के सभी कार्यों का अंतिम उत्तरदायित्व राजा पर ही रहता था I कोष ,सेना ,अस्त्र के संग्रहालय ,आदि का निरीक्षण राजा को स्वयं करना पड़ता था I गुप्तचरों से मिलकर राज्य की गतिविधि से अवगत रहना तथा अपराधियों को स्वयं दंड देना आदि न्याय कार्य राजा के प्रमुख कर्तव्य थे I इन कार्यों का दायित्व इसी कारण था कि इन्हीं पर सारा राज्य प्रतिष्ठित होता है ६ I

स्वायत्त शासन- 

महाभारत में जनतंत्रीय तत्व को विशेष महत्व दिया गया है I राज्य के अधिकारियों के अतिरिक्त ग्राम तथा नगर की स्वायत्त संस्थाओं को भी प्रचुर अधिकार थे I ग्राम पंचायत का भी उल्लेख हुआ है I इसके प्रधान को ग्राम मुख्य कहा जाता था I वह संभवत जनता का प्रतिनिधि होता था I उसके पास कौन-कौन से अधिकार थे इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है I निगम तथा उसके प्रधान कदाचित नगर के स्वास्थ्य शासन से संबंधित थे I श्रेणी मुख्य का समाज में उच्च स्थान था ७  I नगर की आर्थिक संस्थाएं थी जिनके विधि नियमों को मान्यता राजा को देना पड़ता था I इसके अतिरिक्त प्रजा के स्वायत्त शासन के अधिकारों को अक्षुण्ण रखने के लिए जाति देश तथा कुल के धर्म की भी शास्त्रीय विधान के द्वारा प्रतिष्ठा थी ८  I

सामंत राज्य- 

महाभारत में साम्राज्यवाद का समर्थन मिलता है किंतु उसकी साम्राज्यवादी नीति का उद्देश्य अन्य राज्यों के अस्तित्व को निःशेष कर देना ना था I अधीनस्थ राजा सामंत के रूप में अपने राज्य के शासन का पूर्ण अधिकारी था I उसे विजय सम्राट की प्रभुता अवश्य स्वीकार करनी पड़ती थी I और इसलिए उसे निर्धारित कर विशिष्ट अवसरों पर उपहार तथा भेंट आदि देने पड़ते थे I आवश्यकता पड़ने पर वह अपने अधिराष्ट्र को सैनिक सहायता भी देता था I प्राय सामंत शासक सम्राट की सेवा में उच्च पदों पर भी आसीन किए जाते थे ९ I राजा तथा सामंतगणों का संबंध सौहार्दपूर्ण रहता था पर कभी-कभी अधिराष्ट्र के निर्बल होने पर सामंत उसके विरुद्ध अभीसंधि भी किया करते थे I अतः इसके क्रियाकलापों को जानने के लिए राजा सामंत राज्यों में गुप्तचर की नियुक्ति करता था १० I

पर राष्ट्रनीति- 

विभिन्न राज्यों के पारस्परिक अथवा अंतरराष्ट्रीय संबंधों की स्थिरता एवं उनमें शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए राजनीति के भारतीय आचार्य ने तीन मूल सिद्धांत प्रतिपादित किए हैं यह हैं मंडल सिद्धांत षाड्गुण्यऔर चार उपाय इन सिद्धांतों की कौटिल्य ने सूक्षमतम विवेचना की है I वस्तुतः यह सिद्धांत आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय विधि से कहीं अधिक किंतु विस्तृत विवेचन तो महाभारत में नहीं प्राप्त है किंतु महाभारत में भी हमें द्वादश राज मण्डल उसकी 60 प्रकृतियां और दोनों के सम्मिलित योग 72 का उल्लेख मिलता है I राज्यों के पारस्परिक संबंधों के लिए प्रायः कूटनीतिज्ञ तथ्यों को ध्यान में रखते हुए व्यवहार करना चाहिए अथवा शत्रु पर आक्रमण से पूर्व पार्ष्णिग्रह राजा की गतिविधि को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए ११ I मित्र उदासीन मध्यस्थ तथा शत्रु के प्रति कब कैसा व्यवहार करना चाहिए इसका ज्ञान रखना राजा के लिए आवश्यक कहा गया है I राजा को निर्दिष्ट है कि उदासीन मित्र तथा शत्रु की गतिविधि को जानने के लिए गुप्तचर की व्यवस्था करें I उसको शत्रु उदासीन तथा मध्यस्थ राजाओं के मंडल का सतत ध्यान रखना चाहिए और चार प्रकार के शत्रु तथा शत्रु के मित्रों को भी पहचानना चाहिए १२ I

कदाचित इस मंडल सिद्धांत में शक्ति संतुलन का ध्येय तो था ही साथ ही साथ साम्राज्यवादी नीति को एक व्यवस्थित तथा निर्दिष्ट आदर्श पर आधारित कर देना भी अभिप्राय था I यह आदर्श युद्ध नियम तथा शत्रु के साथ मानवोचित व्यवहार में शामिल है कहा गया है कि शत्रु पर प्रहार करते हुए भी उसके प्रति प्रिय वचनों का और प्रहार करके प्रियवर का प्रयोग करें और उसका शिरोच्छेद करने पर भी उसके लिए रुदन करें और शोक करें शरणागत शत्रु का पुत्रवत पालन करें I युद्ध के नियम थे कि राजा ही राजा के साथ युद्ध करें एक पक्ष का योद्धा विपक्षी को सूचना देकर ही अभियान करें कवचहीन तथा शरणागत विपक्षी को बंदी बना लें किंतु वध ना करें पलायनकारी पर प्रहार तथा बालक वृद्ध और नारी का वध वर्जित था I सिद्धांत था कि यदि शत्रु धर्म युद्ध तो धर्म युद्ध और कुट युद्ध करें तो कुट युद्ध करना चाहिए I धर्म से प्राप्त विजय को निंदनीय माना जाता था १३ I स्पष्ट है कि मंडल सिद्धांत का एक आधार नैतिक नियमों का पालन करना भी था I महाभारत का मंडल सिद्धांत इस अर्थ में अधिक उदार है I

षाड्गुण्य-

मंडल सिद्धांत का पूरक एक अन्य मूलभूत सिद्धांत षाड्गुण्य  है I महाभारत में इसकी महत्ता अनेकशः उद्घोषित की गई है I राजा के लिए  षाड्गुण्य नीति को जानना आवश्यक था I इस नीति का ज्ञाता ही इस पृथ्वी पर उपभोग में समर्थ समझा जाता था I महाभारत में भी प्राचीन राजनीतिक विचारक वातव्याधि की भांति इन गुणों में संधि और विग्रह को ही प्रधानता दी है I इसके अतिरिक्त अन्य गुणों का उल्लेख मात्र प्राप्त होता है I महाभारत में संधि के तीन भेद किए गए हैंI  उत्तम, मध्य तथा अधम I उत्तम को वित्त संधि मध्य को सत्कार संधि तथा अधम को भय संधि की संज्ञा दी गई है I धन के आदान-प्रदान से अर्जित संधि वित्त संधि I आधार संधि द्वारा प्राप्त संधि सत्कार संधि तथा भय के कारण की गई संधि भय संधि थी १४ I महाभारत के कूटनीति के संबंध में विशेषता यह है कि मित्र ही नहीं शत्रु के साथ भी प्राण की रक्षा के लिए संधि कर लेने का आदेश है कहा गया है कि स्वार्थ की सिद्धि का अवसर देखकर जो राजा शत्रु के साथ संदेह करता है वह महान फल प्राप्त करता है I अन्यत्र उल्लेख है कि क्षीण शक्ति राजा को अल्प फल वादी भूमि स्वर्ण तथा अपनी सेना भी देकर शत्रु के साथ संधि करने का प्रयास करना चाहिए I यदि इसके विपरीत चिन्ह शक्ति कोई शत्रु संधि का आकांक्षी हो तो उसे वही सब वस्तुएं लेकर संधि कर ले I इतना ही नहीं उसके पुत्र को भी बंधक स्वरूप अपने देश में रखने का प्रयत्न करें I संधि का एक यह नियम भी प्रतिपादित किया गया है कि शत्रु के बराबर तथा देश काल को ध्यान में रखकर उसके साथ संधि की जानी चाहिए और शत्रु के साथ संधि करके भी उसका विश्वास नहीं करना चाहिए I जो बलवान व्यक्ति से संधि करके उदासीन हो जाता है उसकी संधि खाए हुए अपाच्य अन्न के समान अहितकारी होती है १५ I

उपर्युक्त संधि नियमों में राज्यों के बीच शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में नीति और आचरण के स्वरूप की व्याख्या की गई है I निसंदेह किसी राज्य विशेष का स्वहित ही इसके स्वरूप का मूल मंत्र था I

विग्रह-

विग्रह का अर्थ है दो राज्यों के बीच चुनाव पूर्ण स्थिति I महाभारत के अनुसार देश धर्म और प्रजा के रक्षक राजा को सदैव युद्ध के लिए सन्नद्ध रहना चाहिए I शत्रु का दमन करना राजा का प्रधान कर्तव्य था I अतः विग्रह के एक पक्ष युद्ध से संबंधित नियमों की भी बड़ी व्यवहार सुलभ मीमांसा की गई है लिखा है कि राजा को दुर्बल शत्रु की भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए I क्योंकि अल्प अग्नि और अल्प विष भी मार डालने में समर्थ होते हैं I शत्रु को विषैला साप की भांति मार डालना ही उचित है १६ I शत्रु का दमन कर राज्य की वृद्धि ही विग्रह की सतर्कता थी I राज्य के हित एवं विस्तार के लिए युद्ध आवश्यक माना गया है I स्वत : युद्ध के औचित्य की व्याख्या करते हुए महाभारत में कहा गया है कि युद्ध करने का वही फल होता है जो अनंत दक्षिणाओं से युक्त यज्ञ का कारण यह है कि क्षत्रियों का संग्राम में जय लाभ करना अथवा प्रारूप सर्ग कर देना ही उनका सनातन धर्म है I इतना ही नहीं लिखा है कि बाणों के चुभने से जो कष्ट होता है उसे योद्धाओं की तप से उत्पन्न शक्ति की उत्तरोत्तर वृद्धि होती है I युद्ध की इस महत्व एवं अनिवार्यता के पीछे यह सिद्धांत नहीं था कि विग्रह का निराकरण प्रथमता युद्ध के द्वारा ही किया जा सकता है I कहा गया है कि उपाय के सफल होने पर ही युद्ध पथ का अनुसरण किया जाए I वस्तुतः युद्ध के द्वारा प्राप्त विजय जघन्य मानी जाती थी I अतः विग्रह नीति भी एक राज्य का दूसरे राज्य के प्रति कैसा आचरण होना चाहिए इसका निर्धारण करती है I

उपाय- 

युद्ध आवश्यक होते हुए भी जघन्य कार्य है I यह महाभारत की युक्ति है युद्ध की अपेक्षा उपाय का आश्रय श्रेष्ठ कर समझा जाता था I अर्थशास्त्र की भांति महाभारत में भी उपाय के चार तत्वों शाम, दंड, भेद, तथा दण्ड को प्रमुखत: स्वीकार किया है १७ I कुछ एक स्थान पर उपाय के सात प्रकार का उल्लेख हुआ है यह है यंत्र, औषधि, इंद्रजाल, साम ,दान, दंड ,तथा भेद I दीर्घकालीन रचना होने के कारण महाभारत में सिद्धांतों की अनेक प्रस्तुतियों में कुछ विषमताओं का परिलक्षित होना स्वाभाविक ही था I वैसे निर्दिष्ट चार उपाय ही राज्यों के पारस्परिक आचरण की कसौटी थे दंड का प्रयोग अंतिम साधन माना गया है I कहा गया है कि प्रथमत: सम नीति और उसके सफल होने पर भेद नीति व्यवहार में लानी चाहिए I जब उसमें भी सफलता न मिले तो दान नीति और इन तीनों की असफलता के बाद युद्ध का प्रयोग करना चाहिए जो शत्रु शाम और दान से प्रसन्न न हो उसे पर दंड का प्रयोग करना चाहिए १८ I महाभारत में मध्यम मार्ग का आश्रम ही युक्ति संगत कहा गया है I भेद नीति को इसमें विशेष महत्व दिया गया है I बृहस्पति का कथन है कि राजा शत्रु के प्रति पहले भेद नीति का और तत्पश्चात दंड नीति का प्रयोग करें १९ I

इस प्रकार हम देखते हैं की महाभारत की पर राष्ट्र नीति अर्थशास्त्रीय सिद्धांतों का पूर्णतया पालन करती है किंतु उस पर धर्म शास्त्रीय परंपरा का इतना प्रभाव अवश्य है कि कूटनीति तत्व नितांत लौकिक उद्देश्यों पर आधारित होते हुए भी धर्म की उदार भावना से अनुप्राणित थे I

गणतंत्र राज्य- 

महाभारतकार की कौटिल्य की भांति गणराज्य में अनास्था न थी II गणराज्य के प्रति उसकी सौहार्दपूर्ण नीति थी I महाभारत में गण तथा संघ दोनों शब्द पृथक पृथक अर्थ में प्रयुक्त किए गए हैं I गण शब्द प्रजासत्तात्मक राज्य के अर्थ में और संघ कई राज्यों के संघटक के रूप में परिभाषित किए गए हैं  I गण राज्यों का उल्लेख सभा पर्व में कई स्थानों पर हुआ है २० I

महाभारत में अनेक गणराज्य का उल्लेख मिलता है जिसमें यौधेय, मालव, शिवि, औदुम्बर ,अन्धक, वृष्णि, त्रिगर्त ,माध्यमकेय ,अम्बष्ठ, वातधान ,यादव ,कुकुर ,भोज ,आदि प्रमुख थे I संभवतः महाभारत के समय में यादव, कुकुर ,भोज ,अंधक ,,और विष्णि गणों ने परस्पर मिलकर एक संघ बनाया हुआ था I इसके अन्यतमक संघ मुख्य कृष्ण थे I महाभारत की कथा से कृष्ण का घनिष्टम संबंध है I अतः स्वाभाविक रूप से महाभारत के अनुशीलन द्वारा इस संघ के संबंध में शांति पर्व में विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि भीष्म ने कहा इस संबंध में वह प्राचीन इतिहास उद्धृत करने योग्य हैं I जिसमें वासुदेव और महर्षि नारद का संवाद उल्लेखित किया गया है I

संदर्भ ग्रंथ

१-महाभारत शांतिपर्व 49.33

२-महाभारत शांतिपर्व 87.2-8

३-महाभारत शांतिपर्व 88.3-8

४-वही 9

५-वही 87.9

६-महाभारत शांतिपर्व 19.20

७-महाभारत आरण्यक 238.15

८-महाभारत शांतिपर्व 59.71- 66.23

९-महाभारत सभापर्व 13.9

१०-महाभारत शांतिपर्व गीता 83.30

११-महाभारत सभा गीता 5.48

१२-महाभारत आश्रम गीता 6.1.6

१३-महाभारत शांतिपर्व 96-97, 46-48 ,100/12-14

१४-महाभारत शांतिपर्व 59.37

१५-अर्थ 7.1.7

१६-महाभारत शांतिपर्व 12 0/1 4-15

१७-महाभारत सभा 5.5 1 49.4 1 कारण 6.11-12

१८-महाभारत शांति पर्व 104.3

१९-वही 27

२०-महाभारत शांतिपर्व 24/15-25,29/5-6

Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.

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