महाभारत में राजा तथा राज्य का उद्देश्य

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राजा- 

राज्य की अवधारणा में रजाधिकार का चाहे जो भी स्वरूप स्वीकृत था I राजा की सर्वोच्च गरिमा सर्वमान्य थी I वह स्वयं एक शासन का केंद्र बिंदु था  I उस पर राज्य के ध्येय की पूर्ति का गुरु दायित्व था I स्वाभाविक था कि उसके प्रति जन सामान्य की आस्था देवतुल्य हो उल्लेखित है कि राजा गुरु की भांति आदरणीय है I १ आचार्य संबंधी स्नातक और प्रिय मित्र की भांति उसे भी अर्थ देकर सम्मानित करना चाहिए I राजा संपूर्ण जगत को धारण करने वाला है I अतः धर्म और प्रजा का योग 6 राजा पर ही आधारित है I राजा प्रजा का प्राण तथा धन का रक्षक है I वह त्रिवर्ग का मूल एवं चारों युगों का सृष्टि कर्ता है I २ निसंदेह वह प्रजा की संरचना उसके सर्वांगीण विकास तथा सामाजिक दायित्व का प्रथम और अंतिम आश्रय है I अतः महाभारत में कहा गया है कि मनुष्य पहले राजा को प्राप्त करें तत्पश्चात धन और पत्नी ३ राजा का अतिशय महत्व तथा सम्मान था उसकी अवज्ञा का सर्वथा निषेध था I

देव सदृश प्रतिभा ही राजा के लिए श्रद्धा का मापदंड था I  उसमें राजोचित गुण होना अनिवार्य था I गुण संपन्न व्यक्ति ही शासन का न्यायोचित अधिकारी और वांछनीय था I राजा को शील संपन्न ,दांत ,मृदु धार्मिक ,जितेंद्रिय, सुदर्शन, स्थूल, लक्ष्य, सत्यवादी, विक्रांत ,आत्मवान ,जीत, क्रोध, त्रई, शास्त्र, विद, साधु ,पुरुषों का पालन तथा असाधु का दमन करने वाला एवं प्रजा को धर्म मार्ग पर स्थिर रखने वाला राजा ही श्रेष्ठ माना जाता था I महाभारत में राजा के लिए यह भी निर्देशित है कि उसमें दीघार्यु ,सूत्र ,प्रमाद ,मात्सर्य, नृशंसता ,मान ,स्तब्धता ,परछिद्रान्वे ,आलस्य काम ,क्रोध ,तथा लोभ आदि अवगुण नहीं होने चाहिए I व्यसन ग्रस्त राजा अनादर का पत्र होता है I यह उसके पतन के कारण होते हैं ऐसा शास्त्रों में उल्लेखित है I

राजा में विभिन्न गुणों का होना आवश्यक है तभी वह दंड का उपयोग कर सकता है राजा सामान्य व्यक्ति नहीं है I ४ उसके ऊपर राज्य समाज व्यवस्था का भारी बोझ है I महाभारत में राज्य की उत्पत्ति का वृत्तान्त प्रस्तुत किया गया है I यह तिवर्ग की रक्षा में आता है लेकिन वह निरंकुश नहीं है I उसके ऊपर व्यापक नियंत्रण है I महाभारत में राजा और दंड नीति का अन्यन्याश्रित संबंध है I राजा समाज के बौद्धिक शक्ति के प्रणेता ब्राह्मणों की नियुक्ति करता है I जिसमें पुरोहित और विद्वान शामिल हैI  महाभारत में ब्रह्मा और क्षत्र शक्ति का पारस्परिक संबंध दिखाया गया है I यह संबंध समृद्धि का सूचक है I महाभारत में राजा और राज्य की उत्पत्ति वर्णआश्रम की सुरक्षा में होती है I ब्राह्मण की रक्षा के अभाव में अराजकता उत्पन्न होती है I ५ महाभारत में ब्राह्मण उच्चता को प्रतिस्थापित किया है I राजा को दंड का उचित प्रबंध करना चाहिए I सामाजिक संघर्षों में यदि प्रजा को कष्ट होता है तो उसका दोषी राजा स्वयं है I जो राजा ब्राह्मण की पूजा नहीं करता वह नष्ट हो जाता है I इसलिए राजा के लिए ब्राह्मण पूजा अनिवार्य है I राजा को चाहिए कि वह अपने मंत्रिपरिषद को संतुष्ट रखें वही राजा सर्वश्रेष्ठ है जो न्याय प्रिय है और धर्म से संचालित होता है I राजा समाज के वृद्धो की रक्षा के दायित्वों का निर्वाह करता है I राजा समाज का पिता है इसलिए उसे प्रत्येक व्यक्ति का पितृत्व संरक्षण करना चाहिए  I राजा को चाहिए कि वह ज्ञान ,विनय ,और तपस्या के सहारे स्वर्ग की समस्त सुविधाएं अपने राज्य में प्रजा को दे I ६ राजा और तपस्वियों का बाल समान होता है इसलिए राज्य करना तपस्या करना है I जिस राजा में अक्रोध , सत्य वचन, अहिंसा ,इंद्रिय ,संयम ,सरलता ,द्रोह ,हीनता, अभिमान ,रहितता, लज्जा, सहनशीलता ,मनोनिग्रह ,होता है वही राजा आदर्श राजा माना जाता है I राजा को चाहिए कि दान जैसी सामाजिक संस्था को पूर्ण प्रशय दें I महाभारत में दान की प्रवृत्ति का निर्धारण किया गया हैI  अनैतिक और भ्रष्ट राजा राज्य और समाज को भ्रष्ट करता हैI जो राजा अपनी रक्षा के दायित्वों का नहीं निर्वाह करता उसे पागल कुत्ते की भांति मार डालना चाहिए I राजा तभी कर लेने का अधिकारी है जब वह सुरक्षा के दायित्व का निर्वाह करता है I राजा और प्रजा का संबंध सुरक्षा से जुड़ा है I राजा का अस्तित्व समाज की योगक्षेम पर निर्भर करता है  I ७ जो राजा राज्य का आर्थिक दृष्टि से समृद्धि करता है वह राजा अधिक राज कहलाता है I भूमि सुधार और समाज के भूमिहीनों का भूमि दान से बड़ा राजा के लिए कोई पुण्य नहीं है I राजा का ऐसा बहुमुखी व्यक्तित्व ही राज्य के उद्देश्य अथवा उसके व्यापक कार्यों का संपादन सफलतापूर्वक कर सकता है I 

राज्य के उद्देश्य- 

महाभारत के रचनाकाल तक राज्य ही नहीं साम्राज्यों का भी प्रतिस्थापन हो चुका था I सामाजिक संगठन सुदृढ हो गए थे और विभिन्न एवं सामाजिक संस्थाएं अशतः स्वशासित इकाइयां बन राज्य की केंद्रीय भूत सत्ता को अधिक उदार बनाने में सफल हुई थी I अतः एक ओर जहां राज्य सत्ता का विस्तार प्रस्तुत हुआ वहां दूसरी ओर राज्य सत्ता पात्विचित नियंत्रित भी हो गई I इस नियंत्रण में उसके कार्य सीमित नहीं हुए अपितु सामाजिक आवश्यकताओं की जटिलता में अधिक व्यापक होते गए I जनहित संवर्धन राज्य का ध्येय नैतिक था I धर्म अर्थ तथा काम के साधनों का विकास कर प्रजा के सर्वोच्च हित को साध्य प्राप्त बनाना उसका दायित्व था I उसे राजनीतिक ही नहीं अपितु धार्मिक सामाजिक आर्थिक आदि सभी कार्यों का संपादन कर अपने उच्चतम ध्येय की पूर्ति करना था I महाभारत में अर्थशास्त्र के समान राज्य के कार्यों का उतना स्पष्ट और विशद विवरण नहीं दिया गया है I परंपरा के अनुसार ब्रह्मा द्वारा प्रणीत नीति शास्त्रों में निर्देशित है कि राज्य शांति सुव्यवस्था ८ सुरक्षा तथा न्याय आदि कार्यों का संपादन अनिवार्य रूप से करते थे I आधुनिक राजनीति शास्त्र की परिभाषा में जिसे एच्छिक अथवा सामाजिक कार्य कहा गया है उसकी संपन्नता भी राज्य का दायित्व था I

अधिकांश शास्त्रकारों ने अर्थ को जीवन की सफलता का मूल माना है I महाभारत में भी वार्ता को लोक जीवन का आधार कहा गया है I ९ आर्थिक क्षेत्र में ए हस्तक्षेप की नीति का पालन महाभारत में भी नहीं किया गया है I कृषि वाणिज्य उद्योग आदि निजी प्रतिस्पर्धा के विषय नहीं थे I उस समय राज्य का नियंत्रण एवं संरक्षण दोनों ही था I कहा गया है कि कृषि को रक्षा वाणिज्य तथा इस प्रकार के अन्य व्यवसायों को जो जिस कर्म के करने में कुशल हो उसे करना चाहिए I १० अतः इन व्यवसायों की राज्य द्वारा व्यवस्था एवं नियंत्रण सिद्ध होता है I कृषि की उन्नति के लिए राजा कृषकों को आवश्यक सहायता देता था I कृषि के सुविधाओं के लिए जल से पूर्ण तडाग तथा कूप आदि का निर्माण करवाया जाता था II अन्न तथा बीज को नष्ट होने से बचने के लिए विधिवत प्रयत्न किया जाता था I कृषको को राज्य की ओर से निश्चित ब्याज पर रुपया भी दिया जाता था I यह कहा गया है कि स्वल्प वर्ष के कारण यदि कृषक सिंचाई के लिए कूप खोदे तो उनसे कर ना लिया जाए I कृषि की उन्नति के लिए पशुपालन भी आवश्यक था I अतः पशुओं के लिए जलाशय बनवाना राजा का धर्म था वन तथा वृक्ष राष्ट्र की संपत्ति थे I अतः राज्य उसकी संरक्षण पर समुचित ध्यान देता था I फलदायक वृक्षों का काटना वर्जित था I ११ वन राज्य की आय के साधन थे I उन पर कदाचित राज्य का स्वामित्व था  I

वाणिज्य तथा शिल्प की उन्नति के लिए राज्य का इन पर भी नियंत्रण तथा संरक्षण था I उल्लेख है कि राजा को व्यापारियों की पुत्र के समान रक्षा करनी चाहिए I व्यापारियों के समान तथा उसके मूल्य का भी निरीक्षण किया जाता है I १२ शिल्पियों की रक्षा और सहायता करना राजा का कर्तव्य था I अतः राज्य अपेक्षाकृत लघु उद्योगों को भी संगठित एवं संचालित करता था I जैसे काष्ठ ,लोहा, धान की भूसी, कोयला ,बास ,लकड़ी ,सिंग ,हड्डी ,मज्जा, तेल ,घी ,चमड़ा ,आदि I राजा को निर्देश है कि वह इन सब का संग्रह करें I कदाचित राज्य का इन पर एकाधिकार ना था I इसके उत्पादन पर अवश्य राज्य का स्वामी तथा राज्य इन व्यवसाययों का संगठन तथा संचालन तो करता था किंतु वस्तुओं का निर्माण एवं विक्रय नीति रूप से होता था I तत्कालीन विभिन्न व्यावसायिक तथा लघु आर्थिक संघ इसके प्रमाण हैं I

इस प्रकार महाभारत से ज्ञात होता है कि राज्यों में अर्थव्यवस्था यथेष्ठ रूपेण राज नियंत्रित थी I कृषि पशुपालन तथा वाणिज्य लोक जीवन के आधार समझे जाते हैं I लोक हितकारी राज्य आर्थिक ही नहीं जनकल्याणकारी धार्मिक कार्य भी करता था I कहा गया है कि धर्म के लिए धन का त्याग धन का दूसरा उपयोग है १३ I अतः राजा को दीन ,अनाथ, वृद्ध ,तथा विधवा स्त्रियों के योग क्षेम तथा जीविका का सदा प्रबंध करते रहना चाहिए I उसे आश्रम में यथा समय वस्त्र ,भोजन ,और पात्र आदि सामग्री भी भेजते रहना चाहिए I वस्तुतः स्वयं धनार्जन में असमर्थ व्यक्तियों के भरण पोषण का दायित्व राजा पर ही था  I ब्रह्मचारी, श्रोत्रिय ,तथा तपस्वियों की जीविका के लिए अपेक्षित वस्तुओं का प्रबंध करना राज्य का ही कर्तव्य समझा जाता था I

इन जन हितकारी कार्यों के अतिरिक्त राजा समाज के उन प्रदूषणों के प्रति भी सजक रहता था जो सामाजिक हित के प्रतिकूल थे I कहा गया है कि मद्यशाला चलने वाला ,वेश्याएं ,कुट्टनियाँ ,वेश्याओं  के मध्यस्थ ,धुत कर्मी तथा ऐसे निकृष्ट व्यवसाय करने वाले अन्य सभी लोग राज्य को हानि पहुंचा सकते हैं I अतः इन सबको दंड देकर दबाए रखना चाहिए I राज्य में उनकी उपस्थिति कल्याण मार्ग की प्रजा को बाधा पहुंचती है I लोक हितार्थ ही एक इन कार्यों को करता था किंतु यह कहना  अत्युक्ति  होगी कि उस काल में समाज में यह निम्न वर्गी जीव नहीं थे अथवा राज्य का प्रयास इन्हें समाप्त कर देने का था I महाभारत के इन विधान का इतना ही आशय है कि समाज के अंदर रखने में समर्थ होकर भी उन्हें नियंत्रित नहीं रखता वह इसके द्वारा किए गए पाप का चतुर्थांश स्वयं भोगता है I १४

अर्थ तथा धर्म ही नहीं काम के साधनों का भी विकास करना राज्य का उत्तरदायित्व था I अतः जीवन के  सांस्कृतिक पक्ष के संवर्धन राज्य कला साहित्य तथा विज्ञान को यथेष्ट संरक्षण एवं प्रोत्साहन देता था I महाभारत में उल्लेखित है कि राजा स्वयं शिक्षित और विद्या अनुरागी होते थे I महाभारत में कहा गया है कि जो लोग वेद विद्या के अध्ययन के अंतर्गत कार्य में अथवा वेदोत्त यज्ञ योग आदि कर्मों में बाधा पहुंचाते हैंI  वे साहसिक हैं उन साहसिकों का वध करने के लिए ही ब्रह्मा ने क्षत्रिय जाति की सृष्टि की है I कदाचित शिक्षा के विकास एवं परिवर्तन की परिस्थितियों को निर्विघ्न बनाना राज्य का प्रधान कर्तव्य है I राजा विद्वान शिक्षार्थी ब्राह्मणों को ससम्मान आर्थिक सहायता दिया करता था I इन विद्या सेवियों को राज्य से पूर्ण सत्कार प्राप्त था I राज्य का ध्येय नैतिक था I जीवन के विविध पक्षों का विकास का प्रजा के सर्वोच्च हित का साधन ही राज्य का लक्ष्य था  I राज्य के कार्य की सीमा विस्तृत थी किंतु कार्यों के इस विस्तार में राज्य स्वयं सत्य नहीं साधन ही था I प्रजा का हित ही राजा का हित था I धर्म चरण करने वाला राजा धर्मात्मा नहीं पापात्मा कहा जाता था I १६

राज्य के प्रतिबंध- 

नैतिक ध्येय की पूर्ति में राज्य के कार्य व्यापक थे किंतु कार्य के इस विस्तार में राज सत्ता समिति राज्य संबंधी जिन तत्वों का अब तक विमर्श किया गया है I उससे भी सिद्धांततया सीमित राज सत्ता की ही निष्पत्ति होती है I सीमित का अभिप्राय है राज सत्ता पर नियंत्रण भारतीय राजनीति शास्त्रकार कभी भी राज्य की निरंकुशता के परिपोशाक ना थे I समाज विज्ञान को मान्यता देते हुए उन्होंने राज्य के कुछ मूलभूत प्रतिबंधों को जो राज्य संगठन के स्वरूप में थे शास्त्रकित कर राज शक्तियों को सीमित कर दिया प्रतिबंधों की यह विशेषता संवैधानिक ना होते हुए भी उनको वैधानिक स्वरूप दिलाने में समर्थ कही जा सकती है I

राज सत्ता पर धर्म का प्रतिबंध था  I राजा धर्म के अधीन था वह समाज की रीति परंपराओं तथा धार्मिक नियमों में प्रत्यक्ष रूप से हस्तक्षेप नहीं कर सकता था I शास्त्र विहित सामान्य व्यवस्थाएं ही उसके शासन की विशेष परिधि थी राजा पृथु को यह प्रतिज्ञा करनी पड़ी थी कि वेद में दंड नीति से संबंध रखने वाले नित्य कर्म का वे निशंक होकर पालन करेंगे और कभी स्वच्छंद ना होंगे I राजा को कहा गया है की प्रजा में अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए उसे धर्म अनुसार ही आचरण करना चाहिए I १६ सामान्यतया राजा शास्त्रीय विधानों की सीमा का अति  संधान नहीं करता था I विधि के निर्माण में राज शक्ति की स्वच्छंदता को अवसर मिलता है किंतु कौटिल्य को छोड़कर अन्य शास्त्रकारों ने विधि निर्माण का अधिकार राज्य को नहीं दिया I महाभारत में भी नहीं दिया गया है I महाभारत में उल्लेखित है कि जो राजा स्थान कुल एवं अवस्था का मान रखते हुए कार्य करता है वह सभी आश्रमों में पालन करने का फल प्राप्त करता है I १७ अतः विधि निर्माण के अभाव में राजा को कुल धर्म देश धर्म तथा जाति धर्म के अनुसार शासन करना चाहिए I इन सामान्य नियमों से ही राज सत्ता नियंत्रित नहीं हुई थी I राजा के द्वारा वर्ण आश्रम धर्म का संरक्षण भी राज्य पर एक प्रबंध कहा गया है I कहा गया है कि राजा समस्त प्रजा को अपने-अपने धर्म को स्थापित करके उनके द्वारा शांतिपूर्ण कर्मों का धर्म के अनुसार अनुष्ठान करावे I १८ वर्ण धर्म आदि शक्ति अर्थ तथा श्रम के सामंजस्य का सिद्धांत था तो आश्रम धर्म राजनीतिक सामाजिक और व्यक्तिक तीनों पक्षों के समन्वय का दर्शन था I राजशक्ति का आधार श्रम और अर्थ था तथा राज्य के उत्कर्ष का आश्रय बहुश्रुत व्यक्तित्व एवं पारस्परिक अंतर निर्भरता में सामाजिकता की उच्च भावना I १९ अतः इस संतुलन में राज्य सत्ता स्वतः संकुचित हो गई I राज्य पर धर्म का यह प्रतिबन्ध निसंदेह धर्म सूत्रों से गठित सामाजिक व्यवस्था का परिणाम था I

संदर्भ ग्रंथ

१-महाभारत आश्रम 3.36

२-महाभारत शांतिपर्व 70.25

३-महाभारत आदिपर्व 148.12 शांति पर्व 57.41

४-शांतिपर्व 59.12

५-शांतिपर्व 74.16

६-अनू पर्व35.11

७-अनु पर्व 60.23

८-महाभारत शांतिपर्व 53.77

९-महाभारत आरण्यक 198.23

१०-महाभारत शांतिपर्व 89.23

११-महाभारत शांतिपर्व 92.25

१२-महाभारत शांतिपर्व 87.3

१३-महाभारत शांति पर्व 59.58

१४-महाभारत शांतिपर्व - वही

१५-महाभारत शांतिपर्व 91.4.6

१६-महाभारत शांतिपर्व 58.20

१७-महाभारत शांतिपर्व 66.21

१८-महाभारत शांतिपर्व 60.19

१९-महाभारत शांतिपर्व - वही

Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.

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