महाभारत में राज्य की उत्पत्ति का सिद्धांत

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दैवी सिद्धांत- 

महाभारतकार ने पूर्व कालीन राजनीति शास्त्रकारों की भांति राज्य की उत्पत्ति का सिद्धांत प्रतीक्षतया नही प्रतिपादित किया गया है I राजपद का प्रादुर्भाव सामाजिक स्थिरता के लिए राजा की अनिवार्यता तथा राजत्व के स्वरूप के विमर्श में राज्य की उत्पत्ति का सिद्धांत में विश्वास न था I किंतु राजतंत्र में राज्य के स्थायित्व के लिए दैवी तथ्य किस सीमा तक क्रियाशील हो सकते हैं I इसका ज्ञान उन्हें था I अतः उन्होंने राज्य की उत्पत्ति की दैवी उपकरणों का प्रासंगिक आश्रय लिया I युधिष्ठिर ने भीष्म से कहा कि इस सारे जगत का जो एक ही व्यक्ति को देवता स्वरूप मानकर नतमस्तक हो जाता है I कोई स्वल्प कारण नहीं हो सकता  १ कृपा कर मुझे बताइए की लोक में यह जो राजा शब्द चला आ रहा है उसकी उत्पत्ति कैसे हुई I २ उत्तर में भिष्म ने कहा कि पहले ना कोई राज्य था ना राजा ना दंड था ना कोई दंड देने वाला I समस्त प्रजा धर्म के द्वारा ही एक दूसरे की रक्षा करती है किंतु इस धर्म व्यवस्था का शीघ्र ही हरास हो गया और कर्तव्य च्यूत मोहातुर व्यक्तियों का समाज अव्यवस्था की पराकाष्ठा पर पहुंच गया I देवगण ने ब्रह्मा के पास जाकर उन्हें इस स्थिति से अवगत कराया I ३ ब्रह्मा जी ने उन्हें सांत्वना देते हुए उनके कल्याण की विधि बताइ I सर्वप्रथम उन्होंने नीति शास्त्र की रचना की I इस शास्त्र में त्रिवर्ग के साधन के आधार पर व्यक्ति समाज तथा राज्य तीनों के प्रकर्ष की विधियां थी I इसमें राजा को अधिकार व कर्तव्य राज्य का स्वरूप एवं उसकी आंतरिक एवं बाह्य नीति से संबंधित सभी तत्वों का निरूपण था I तत्पश्चात भगवान नारायण ने भली भांति विचार कर मानस पुत्र बिरजा की सृष्टि की I ४ यहां मानस पुत्र शब्द ब्रह्म के पुत्र का वाचक नहीं है I प्रत्युत्त वह मानस ऊहापोह एवं बुद्धि बल के द्वारा सर्वथा उपयुक्त व्यक्ति का चयन ही हैI  ब्रह्मा जी ने मनुष्यों में से किसी योग्य व्यक्ति का नाम बतलाने को देवगण से कहा था I बिरजा के बाद राज पद का सबसे कुशल और धर्मज्ञ अधिकारी पृथु शासक हुआ I ५ वह बहुश्रुत नीति शास्त्र का ज्ञाता और मर्मज्ञ था I ६ उसने प्रिय और अप्रिय का विचार छोड़कर काम ,क्रोध, लोभ तथा मोह को त्याग कर प्रजा पर सम भाव से शासन किया I उसके राज्य में किसी को बुढ़ापा दुर्भिक्ष तथा आदि व्याधि का कष्ट नहीं था I चोरों आदि से आपस में कोई भय नहीं था I ७

उपर्युक्त उल्लेखों से स्पष्ट है कि मानव जीवन की संरक्षा तथा विकास सामाजिक सुविधावस्था और स्थिरता के लिए राज्य संस्था अनिवार्य है I सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक तथ्य इन युक्त में यह है कि किसी राज्य का एक विधान हो जिसमें शासन विधि प्रशासनिक अंग एवं राज्य के उद्देश्य का विवरण रहे I कदाचित ब्रह्मा के द्वारा नीति शास्त्र के निर्माण का यही आशय था I राज्य पद अनुवांशिक होते हुए भी राजा राज्य के सात अंगों में से एक था I जिसमें शासन की उपर्युक्त सभी क्षमताएं हो वही राजा था I समस्त प्रजाओं का रंजन के कारण वह राजा था I ८ इसी कारण एक अन्य स्थल पर उल्लेखित है कि समस्त नरेशों में राजा पृथु को ही यह सारा जगत देवता के समान शीश झुकाता है  I राजा के दैवी गुणों के कारण ही प्रजा उसके अधीन रहती है  I प्रजा की इस अधीनता को न्यायोचित बदलते हुए कहा गया है कि राजा को एक मनुष्य मात्र समझकर उसकी अवहेलना नहीं करनी चाहिए I मनुष्य के रूप में वह महान देवता है I समय अनुसार वह अग्नि सूर्य मृत्यु कुबेर तथा यमराज का रूप धारण करता है I ९ यह देवगण निग्रह तथा अनुग्रह द्वारा संपादित राज्य के विभिन्न कार्यों के प्रतीक हैं I उनके द्वारा राजा को देवता बना देने का प्रयास नहीं था I राजा में और सामान्य मानवीय गुणों एवं क्षमताओं की उपस्थिति होने से ही उसे देवता की संज्ञा दी गई थी I

स्पष्ट है कि महाभारत में राजपद की उन्नति एवं राजत्व की उत्पत्ति एवं उसके स्वरूप की मानवीय चिंतन शैली है I उसमें राज्य की उत्पत्ति के दैवी सिद्धांत को स्थान नहीं था  I राज्य की दैवी उत्पत्ति शासन का दैवी अधिकार तथा राज्य निरंकुशता आदि जो दैवी सिद्धांत के मूल तत्व हैं I महाभारत के किसी भी स्थल पर मिमांसित नहीं है I राज्य में दैवी भावना का आरोपण अवश्य किया गया था I राज्य के प्रति एक पुनीत आस्था थी I राज्य के कर्तव्य का जन सेवा एवं मानव हित के तादात्मय  ही राजा के देवत्व का उत्तरदाई कारण बना  I राज सत्ता निरंकुश ना थी अन्य धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्थाओं के साथ राजा को ब्राह्मण को अदण्डनीयता एवं धर्म में विश्रुत ब्रह्मर्षियों के द्वारा निर्देशित विधि विधान के पालन का वचन देना पड़ा था  I १० अतः इन परिस्थितियों में राज्य की उत्पत्ति के दैवी सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया गया  I

समाज अनुबंधवाद का सिद्धांत-

राज्य की उत्पत्ति में महाभारत कालीन राजनीतिक नेताओं ने समझौते के सिद्धांत की संयोजना नहीं की I दैवी सिद्धांत के संदर्भ में निरूपित किया जा चुका है कि राज्य संस्था की अनिवार्यता ही उसके प्रादुर्भाव का कारण थी I कुछ विद्वानों का मत है कि महाभारत में समाज अनुबंधवाद का सिद्धांत मान्य था किंतु उसमें उल्लेखित तथ्यों के विश्लेषण से यह मत समर्थित नहीं हो पाता I महाभारत में एक उल्लेख है कि पहले ना कोई राज्य था ना राजा धर्म के द्वारा प्रजा एक दूसरे की रक्षा करती थी I ११ महाभारत के अनुसार पूर्व काल में धर्म का शासन था I वैदिक अनुष्ठान यज्ञ तथा वेद ज्ञान आदि विधिपूर्वक किये जा रहे थे I ब्रह्मा के मानस पुत्र बिरजा की उत्पत्ति के साथ राज पद तथा राज्य का प्रादुर्भाव हुआ I प्रथम शासक पृथू से यह प्रतिज्ञा करवाई गई कि वेद में दंड नीति से संबंध रखने वाला जो नित्य धर्म बतलाया गया है  I उसका वह निशंक हो पालन करेगा तथा स्वच्छंद ना होगा  I धर्म पराड्मुखी को दंडित करना प्रिय अप्रिय  के विचार का त्याग कर समस्त प्राणियों के प्रति समभाव रखना था कि जिस भी शासन तथा राज्य से संबंधित कार्य करने की आज्ञा होगी उसे वह अवश्य करेगा I १२ इन कथनों में सामाजिक अनुबंध का प्रतिभास नहीं है I इसमें प्रजा के अधिकार एवं कर्तव्यों का कोई उल्लेख नहीं है I समझौते के द्वारा प्रजा ने अपने कौन-कौन से अधिकार राज्य को समर्पित किया राजा किन शर्तों को पूरा न करने से पदच्यूत किया जा सकता है आदि तत्वों का कोई व्याख्या नहीं की गई है  I वस्तुत इस राज्य संबंधी विवरण का उद्देश्य सीमित राज सत्ता जन सेवा और राज्य की अपेक्षा की प्रजा हित की प्रधानता के सिद्धांत को प्रतिपादित करना था ना कि अनुबंध के द्वारा राज्य की उत्पत्ति अथवा राज्य के निर्माण को प्रस्तुत करना I

महाभारत में एक अन्य स्थल पर राज्य की उत्पत्ति में सामाजिक अनुबंध का आभास सा मिलता है I  भीष्म ने कहा कि सुनने में आया है कि जैसे पानी में बलवान मत्स्य निर्बल मत्स्यों को खा जाते हैं उसी प्रकार पूर्व काल में राजा के न रहने पर प्रजा वर्ग के लोग पारस्परिक विनाश में रत हो नष्ट हो गये I अराजकता की स्थिति में किसी के धन एवं स्त्री पर उसी का अधिकार बना रहे यह संभव नहीं था I १३ ऐसी अवस्था में अन्य के धन के अपहरणकर्ता पात की का बोलबाला रहता है परंतु जब दूसरे उसका भी सब द्रव्य छीन लेते हैं तब वह राजा की आवश्यकता का अनुभव करता है I १४ धर्मशासित युग की समाप्ति पर विकसित अनुशासनहीन काल भीष्म के पूर्व काल का द्वितीय चरण है मत्स्य न्याय का युग जीवन के अस्तित्व के लिए संघर्ष का योग था  I इस स्थिति के निराकरण के लिए राज्य संस्था आवश्यक है  I

महाभारत में आगे उल्लिखित है कि इस अराजकता की समाप्ति के लिए सब लोगों ने मिलकर आपस में एक नियम बनाया इन नियमों के द्वारा अल्पकालिक शांति व्यवस्था ही हुई I अतः प्रजाएं ब्रह्मा के पास गई जिन्होंने मनु को राजा होने की संज्ञा दी I १५ मानव प्रकृति के मिथ्याचारी होने के कारण मनु ने राजत्व ग्रहण करना अस्वीकार किया तब उन जनों से मनु से राजपद स्वीकार करने का विनय किया और कहा प्रजा का सहयोग पाकर आप एक प्रबल तथा प्रतापी राजा होंगे I हम लोग आपकी कोष वृद्धि के लिए प्रति 50 पशु पर एक पशु स्वर्ण का 50 वां भाग तथा धन की उपज का दसवां भाग कर के रूप में देंगे I मनु के द्वारा राजत्व की स्वीकृति प्रजा का उन्हें सहयोग को समृद्धि के निमित्त करादि देने के निश्चय मात्र से शासन तथा शासित के बीच कोई समझौता नहीं सिद्ध होता  II प्रजा ने मनु का निर्वाचन नहीं किया और ना मनु ने सत्ता ग्रहण करने की कोई शर्त रखी I प्रजा के अधिकार और कर्तव्य की भी कोई व्याख्या नहीं हुई I अतः यह कोई अनुबंध नहीं था इन स्थलों पर वस्तुतः राज्य की अवधारणा के कुछ अन्य तत्वों का विश्लेषण है राजसत्ता सीमित है और राज्य के विविध करो के डर के निर्धारण में परिलक्षित है की सार्वभौम सत्ता जनता में निहित समझी जाती थी I अंततः राज्य के स्वरूप की इस विवेचना में राज्य की उत्पत्ति के अनुबंधवादी सिद्धांत की खोज करना युक्ति सम्मत नहीं है I महाभारत में राज्य एक कृत्रिम संस्था नहीं मानी गई है  I

शक्ति सिद्धांत- 

कुछ राजनीति विज्ञो की सम्मति में राज्य की उत्पत्ति शक्ति के आधार पर हुई है I युद्ध अथवा बल द्वारा बलिष्ठो का बाल हीनों पर प्रभुत्व ही राज्य की उत्पत्ति का आधार था I राज्य की दंड शक्ति उसका साध्य है I वह स्वयं साधन नहीं है कदाचित भारतीय शास्त्रज्ञों ने राज्य के ऐसे स्वरूप की अवधारणा नहीं की थी I महाभारत में ततसंबंधी कोई उल्लेख नहीं है I दंड नीति राज्य का एक अनिवार्य तत्व है I अतः राजा का दण्डधारी होना आवश्यक समझा जाता था I  १६ दंड ही राजा का धर्म था I बल के इस अधिकार का क्रियान्वीकरण राज्य न्यायोचित आधार पर ही कर सकता था I न्याय रूप में ही दंड उच्च आदर्शो धर्म अर्थ काम की पूर्ति का साधन समझा जाता था I १७ स्पष्ट है कि राज्य की यह दंड शक्ति उसकी एक विशेषता थी I राज्य सत्ता को अनियंत्रित नहीं प्रत्युक्त उसे नियंत्रित कर देने का प्रयास ही दंड व्यवहार का सिद्धांत था I शक्तिमात्र राज्य का आधार नहीं था और न इसके द्वारा राज्य की उत्पत्ति में राजनीति शास्त्रकारों का विश्वास था I

सप्तांग सिद्धांत-

राज्य की उत्पत्ति के दैवी सामाजिक समझौता तथा शक्ति के सिद्धांत पश्चात्य दार्शनिकों के राज्य के प्रति एक विशिष्ट दृष्टिकोण से नि : सृत है सप्तांग राज्य की अवधारणा के प्रतिपादन से यह अवश्य स्पष्ट है की राजनीति वेत्ता राज्य को एक स्वाभाविक अथवा प्राकृतिक संस्था मानते थे I आवश्यकता की भित्ति पर उसका क्रमशः स्वत : निर्माण हुआ मानवीय संस्था में मानवीय गुणों का आरोपण कर राज्य के सावयवी स्वरूप की अभिव्यक्ति भी निष्प्रयोजन नहीं थी कहा गया है I राजा प्राजों का प्रथम अथवा प्रधान शरीर है I प्रजा भी राजा का अनुपम शरीर है ना राजा के बिना देश एवं उसके निवासी रह सकते हैं ना देश व देशवासियों के बिना I राजा इस उल्लेख का यह सूक्ष्मार्थ है कि राजा प्रजा एवं देश समन्वित रूप से एक कायिक रचना हैI  अवच्छिन्न होने पर राजनीति की दृष्टि से उसका कोई अस्तित्व नहीं रह जाता राजा तथा व्यक्ति अन्योंन्याश्रित  है किंतु जैसे जीवित सूक्ष्म पदार्थ से निर्मित शरीर उन पदार्थों से भिन्न एक भिन्न व्यक्तित्व है वैसे ही व्यक्तियों द्वारा निर्मित राज्य का अपने निर्माण तत्वों से अलग एक स्वरूप है जिसमें प्रेरणा एवं मानव जीवन के समान महत्व उद्देश्य है I उसी स्थान पर आगे लिखा गया है कि राजा प्रजा की गुरुतम हृदय गति प्रतिष्ठा और उत्तम सुख है I १८ अतः राज्य जीवन की चेतना एवं एक विशिष्ट लक्षण से अनुप्राणित है I भंडारकर का मत है कि हिंदू शास्त्रकारों द्वारा राज्य एक सजीव आध्यात्मिक सावयव माना जाता था I राजा अथवा स्वामी उसकी आत्मा था I इस सिद्धांत के गहनतम तर्क वितर्क तक हिंदू विचारक नहीं गए क्योंकि तब वह पूर्णता दार्शनिक तथ्य बन व्यावहारिक अथवा राज कौशल की दृष्टि से असाध्याय हो जाता है  I हिंदू शास्त्रों का उद्देश्य तो ऐतिहासिक आधार पर राज्य के क्रमिक विकास और उसके एक मानवीय संस्था के रूप में आख्या करना था I दार्शनिक अभिप्राय में राज्य को एक सजीव आध्यात्मिक रचना स्वीकार करने से वही बधित होता है कि राज्य का उद्देश्य नैतिक था I धर्म अर्थ तथा काम के साधनों का विकार कर प्रजा की सर्वोत्मुखी उन्नति को साध्य करना राज्य का दायित्व था I राज्य एवं प्रजा अपने आंगिक संबंध में एक दूसरे के हित पूरक थे I

अन्य ग्रन्थों की भांति महाभारत में भी राज्य के सात अंगों का उल्लेख व्यावहारिक दृष्टि से किया गया है I कहा गया है कि राजा का अपना शरीर मंत्री कोष दंड मित्र राष्ट्र और नगर यह राज्य के सात अंग हैं I राज्य की सावयवी अवधारणा में प्राचीन भारतीय राजनीतिज्ञ के विश्वास को यह उक्ति और अधिक पुष्प कर देती है I यह विभिन्न अंग राज्य के निर्माण तत्व नहीं प्रत्युत आवश्यक अंग है जिसका पारस्परिक संबंध सावयवी  है I राजा को इन सात अंगों की आवश्यक रक्षा करनी चाहिए I राज्य के हास वृद्धि उन्नति तथा अंतर्राज्य संबंधों की सफलता इन्हीं की सफलता पर आश्रित है I १९ अर्थशास्त्र की भांति महाभारत में भी इन अंगों की अंतर निर्भरता तथा आवश्यकता की दृष्टि से समानता का प्रतिपादन होते हुए भी इनमें इन अंगों के एक स्तरीय महत्व की विवेचना नहीं की गई है I कदाचित कौटिल्य राज्य पक्ष को अधिक पुष्ट करना चाहता था I २० किंतु महाभारत के विचारकों ने जन तत्व तथा राज तत्त्व दोनों के गौरव को स्वीकार करते हुए सभी अंगों के समान महत्व पर बल दिया गया है I महत्ता समान होते हुए भी राजा की विशिष्ट स्थिति की स्वीकृति तो की ही गई है I निसंदेह यह स्थिति अधिकार परिवर्तन के लिए नहीं कर्तव्य के दायित्व को पूरा करने के लिए थी I

निष्कर्ष- 

महाभारत में वर्णित राज्य और राजनीति संबंधित जिन तत्वों का विवेचन किया गया है वे सिद्ध करते हैं कि प्राचीन भारत में राजनीतिक विचार की श्रृंखला की वह एक महत्वपूर्ण कड़ी है I उसकी सामंजस्य प्रिय नीति राजनीति के हृदय को उदार करने में यथेष्ट उत्तरदाई है I राजनीति की या परंपरा अनुवर्ती युगों में अक्षुण्ण रही है I

संदर्भ ग्रंथ

१-महाभारत शांतिपर्व 56.12

२-महाभारत शांतिपर्व 5

३-महाभारत शांतिपर्व 93

४-महाभारत शांतिपर्व 94

५-इसके अंतर्गत शांतिपर्व में लिखा है तब वैन्य ने पूज्य देवर्षियों को उत्तर दिया मैं आपके आदेश का अवश्य पालन करूंगा I ब्राह्मण लोग मेरे सहायक हो वैन्य के यह वचन देने पर आचार्य शुक्र ने उसका पुरोहित और वालखिल्यों ने उसका मंत्री होना स्वीकार किया  I

६-शांति पर्व में यह संदर्भ बड़े महत्व का है I

७-महाभारत शांतिपर्व 59.130

८- महाभारत शांतिपर्व 127

९-महाभारत शांतिपर्व 41

१०-महाभारत शांतिपर्व 59.108

११-महाभारत शांतिपर्व 14.15

१२-महाभारत शांतिपर्व 111.114

१३-महाभारत शांतिपर्व 12

१४-महाभारत शांतिपर्व 13

१५-महाभारत शांतिपर्व 21

१६-महाभारत शांतिपर्व 122.36,38,42

१७-महाभारत शांतिपर्व 15.3

१८-महाभारत शांतिपर्व 68.59

१९-महाभारत शांतिपर्व 5 9.51-52

२०-महाभारत शांतिपर्व 53

Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.

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