राज्य की उत्पत्ति का भारतीय सिद्धांत

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राज्य की उत्पत्ति का भारतीय सिद्धांत

राजनीति के विषय पर आधुनिक अध्ययन कार्य ‘राज्य की उत्पत्ति’ के प्रश्न की चर्चा को काफी महत्व देते हैं । भारत में भी एक महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था के रूप में राज्य के उद्भव एवं विकास की अनेक अवधारणाएं विद्यमान रही हैं । इस प्रकार के वाद-विवाद में अक्सर सुदूर अतीत में प्राकृतिक अवस्था का ‘स्वर्ण काल’ तथा समयांतराल में ‘मत्स्यन्याय’ की अवस्थिति की उत्पत्ति का सन्दर्भ अवश्य आता है ।[1] इस अव्यवस्था और अस्थिरता के काल में ही दण्ड के माध्यम से ‘जीवन की सुरक्षा’ और ‘न्याय व्यवस्था’ की प्रतिस्थापना करने के लिए ही शासक, शासन और राज्य के प्रारंभिक स्वरूपों का उदय होता है ।

भारतीय महाकाव्य महाभारत के 12वे भाग शांतिपर्व में उल्लिखित विभिन्न सिद्धांतों के अतिरिक्त, बौद्ध साहित्य दीघनिकाय में ‘महाजनसम्मत’ (जिसे वृहद समाज की सहमति प्राप्त हो) के नेतृत्व में शासन व्यवस्था का उदय तथा इन सभी से भिन्न एक अवधारणा जिसमें विभिन्न जन समूहों की जनसंख्या एवं निवास स्थान के बढ़ते क्षेत्रफल के नियमन, सुरक्षा एवं संसाधनों संबंधी आवश्यकताओं की व्यवस्था संचालन हेतु समय के साथ जनपद के प्रशासन के लिए जनपति, भूपति अथवा राज-व्यवस्थापकों का उदय प्रमुख है ।[2]

हमें महाभारत और दीघनिकाय[3] में राज्य की उत्पत्ति की अवधारणाओं के बारे में एक उल्लेखनीय समानता दिखाई देती है । इन दोनों ही साहित्यों में यह माना गया है कि समाज के निर्माण के बाद लंबे समय तक, सद्भाव और खुशी का एक स्वर्ण युग कायम था जहाँ लोग अपने सहज सात्विक स्वभाव के कारण सुखी और शांतिपूर्ण जीवन जीते थे । हालांकि इस दौरान कोई शासक अथवा सरकार मौजूद नहीं थी ।

शांतिपर्व[4] हमें बताता है कि लंबे समय तक राजा या अदालत के बिना समाज फलता-फूलता रहा, लेकिन बाद में किसी तरह नैतिक पतन हो गया । लोग सत्यनिष्ठा से गिरते गए; लालच, स्वार्थ और कपट ने उनके दिमाग पर कब्ज़ा करना शुरू कर दिया और जिस सांसारिक स्वर्ग का वे आनंद ले रहे थे वह जल्द ही एक वास्तविक नरक में परिवर्तित हो गया ।

अराजकाः प्रजाः पूर्वं विनेशुरिति नः श्रुतम् ।

परस्परं भक्षयंतो मत्स्या इव जले कृशान् । ।[5]

अर्थात हमने सुन रखा है कि जैसे पानी में बलवान् मत्स्य दुर्बल  मत्स्य को अपना आहार बना लेते हैं, उसी पूर्व काल में राजा के न रहने पर प्रजावर्ग के लोग परस्पर एक-दूसरे को लूटते हुए नष्ट हो गये थे । जंगल का कानून लागू होने लगा; ताकतवर ने कमजोर का दमक किया, जैसा कि मछलियों (मत्स्यन्याय) के बीच दिन का सामान्य क्रम होता है । और जब राहत की गुहार और प्रार्थना करने के लिए लोगों का एक प्रतिनिधिमंडल देवताओं से मिला तो देवलोक में चिंता और चिंतन का वातावरण बना और उन्होंने स्थिति का समाधान करने का निर्णय लिया । ब्रह्मदेव ने इस मामले पर विचार किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मानव समाज केवल तभी जीवित रह सकता है जब कानूनों की एक संहिता तैयार की जाए और उसे राजा के माध्यम से लागू किया जाए । उन्होंने एक व्यापक संहिता की रचना की, विराजा नामक एक शासक नियुक्त किया और लोग उसके आदेशों का पालन करने के लिए सहमत हुए ।

शांतिपर्व के अध्याय 67 में अन्यत्र हमें राज्य की उत्पत्ति का थोड़ा भिन्न वर्णन मिलता है, जो पहले चरण में एक असफल अनुबंध को संदर्भित करता प्रतीत होता है ।[6] लोग लंबे समय तक प्रचलित रही ‘जंगल के कानून’ की स्थिति से परेशान हो गए, और फिर उन्होंने आपस में एक सामान्य अनुबंध किया कि दुराचार और व्यभिचार जैसे असामाजिक कृत्यों के दोषी व्यक्तियों को समाज से निष्कासित कर दिया जाएगा । आपस में विश्वास बनाए रखने और समझौते की महत्ता स्थापित करने के लिए ही उन्होंने एक सार्वभौमिक सामाजिक अनुबंध में प्रवेश किया था । जनसामान्य में शांति और सौहार्द की स्थापना न हो पाई, शायद इसलिए कि अनुबंध को लागू करने के लिए कोई राजा या सरकार नहीं थी । फिर वे एक राजा नियुक्त करने के अनुरोध के साथ विश्वनिर्माता के पास पहुंचे । जो एक तरफ तो मानव समुदाय के लिए श्रद्धेय हो और दूसरी तरफ लोगों की रक्षा भी कर सके । इस पर विचार करके विधाता ब्रह्मदेव ने मनु को राजा नियुक्त कर दिया ।

ततो मनुं व्यादिदेश मनुर्नाभिननदं ताः ।।[7]

अर्थात तब ब्रह्माजी ने मनु को राजा होने का आदेश दिया; परंतु मनु ने उन प्रजाओं को स्वीकार नहीं किया । एक दुर्दम्य और असभ्य आबादी पर शासन करना उनके लिए अरुचिकर था किन्तु लोगों ने स्वयं मनु को आश्वासन दिया कि वे कानून का पालन करेंगे और कानून तोड़ने वालों को दंडित करने के लिए राजा किसी भी प्रकार के पाप का भागी नहीं होगा । इसके अतिरिक्त लोगों ने आवश्यक कर का समयबद्ध भुगतान करने पर भी सहमति जताई । ये दो भिन्न सिद्धांत दर्शाते हैं कि महान महाकाव्य में राज्य की उत्पत्ति के बारे में अवधारणाओं के माध्यम से अनुमान लगाया जा रहा है । दोनों सिद्धांतों के अनुसार ईश्वर ने राजा नियुक्त करके मानवता को जंगल के कानून की अवस्थिति से बचने में मदद की ।

इन दोनों ही अवधारणाओं के अतिरिक्त, बौद्ध ग्रंथ दीघनिकाय में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि महाजनसम्मत ने अराजकता को समाप्त करने के लिए लोगों के अनुरोध को स्वीकार कर लिया और इस स्वीकृति के बाद लोगों ने उन्हें अपना राजा चुना । दीघनिकाय के 27 वें भाग ‘अगन्नसुत्त’ में राज्य की उत्पत्ति के विषय को विशेषतः संबोधित किया गया है ।[8] यह सुत्त मानव समाज की उत्पत्ति और सामाजिक और राजनीतिक संस्थानों के उद्भव का एक पौराणिक और दार्शनिक विवरण प्रदान करता है । पहला शासक, जिसे महासम्मत (जिसका अर्थ है “महान निर्वाचित”) कहा जाता है, लोगों की सर्वसम्मति से चुना गया था ।[9] यह चुनाव शासक के गुणों और समुदाय की रक्षा करने, न्याय बनाए रखने और संघर्षों को सुलझाने की उसकी क्षमता पर आधारित था । इस सिद्धांत के अनुसार, इसमें कोई संदेह नहीं है कि सरकार किसी निहित अनुबंध के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आई । ऐसा ही कुछ विचार धर्मसूत्र लेखकों के मन में भी रहा होगा, जब उन्होंने माना कि राजा आम लोगों का सेवक होता है जिस पर सुरक्षा का कर्तव्य होता है और 16% कर उसकी आय होती है ।

अगन्नसुत्त के माध्यम से, दीघनिकाय राज्य की उत्पत्ति पर एक अद्वितीय बौद्ध दृष्टिकोण प्रदान करता है । यह मानवीय लालच और संघर्ष की प्रतिक्रिया के रूप में शासन के उद्भव को चित्रित करता है, जिसमें नैतिक नेतृत्व और लोगों की सामूहिक सहमति पर जोर दिया गया है । राज्य का यह प्रारंभिक विवरण नैतिक शासन, सामाजिक जिम्मेदारी और सामाजिक संरचनाओं की अस्थायी प्रकृति के महत्व पर प्रकाश डालता है, जो प्राचीन और समकालीन दोनों संदर्भों में राजनीतिक और सामाजिक संगठन को समझने के लिए मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान करता है । महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि बौद्ध मान्यताओं में शासक और शासन का प्राधिकार दैवीय नहीं है ।[10] और शासक एक सामान्य व्यक्ति मात्र है जो अपने व्यक्तित्व की मूल्य परायणता एवं व्यवहारिक कुशलताओं के कारण इस सम्मानित पद पर विराजमान हुआ है । राज्य का उदय पूर्णतः सामाजिक और राजनीतिक आवश्यकताओं का परिणाम है ।

यह भी सत्य है कि प्राचीन भारत में अधिकांश संस्थाओं के अस्तित्व को दैवीय प्रेरणा का स्वरूप माना जाता रहा, और राज्य भी इस नियम का अपवाद नहीं था । महाभारत के वृत्तांतों से पता चलता है कि राज्य को एक दैवीय संस्था माना जाता था; राजा का शासन करने का अधिकार आंशिक रूप से उसकी दैवीय रचना के कारण था और आंशिक रूप से अराजकता को समाप्त करने के लिए उसके द्वारा शासित होने वाली प्रजा की सहमति के कारण था । किन्तु, प्राचीन भारत के कुछ साहित्य राज्य की उत्पत्ति के बारे में अधिक गहनता से विचार नहीं करते । जैसे कि शुक्र इस विषय पर कोई विशेष टिप्पणी नहीं करते । इससे पता चलता है कि शुक्राचार्य स्वर्ण युग या सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत में विश्वास करने के लिए अधिक इच्छुक नहीं थे ।

भारतीय चिंतन परंपरा में यह माना गया कि अपूर्ण और अराजक दुनिया में समाज के व्यवस्थित अस्तित्व और प्रगति के लिए राज्य एक अपरिहार्य संस्था है । सरकार के बिना किसी देश का अस्तित्व भी कल्पनीय नहीं हो सकता । सामाजिक अराजकता तभी समाप्त हो पाई जब भगवान ने समाज को एक राजा दिया । इस प्रकार भारतीय राजनीतिक चिंतन ने राज्य को एक दैवीय संस्था माना । इसका अर्थ यह था कि यह समाज जितना ही पुराना हो, इसकी उत्पत्ति उन सामाजिक-राजनीतिक प्रवृत्तियों से हुई है जो मनुष्य के साथ जुड़वाँ रूप में जन्म लेती हैं ।


[1] अनंत सदाशिव अल्तेकर (2021), स्टेट एण्ड गवर्नमेंट इन एनसिएंट इंडिया, मोतीलाल बनारसीदास पब्लिशिंग हॉउस, दिल्ली, पृष्ठ 27.     

[2]  वहीं, पृष्ठ 26-41

[3] दीघनिकाय बौद्ध ग्रंथ त्रिपिटक के सुत्तपिटक का प्रथम निकाय है। दीघनिकाय में कुल 34 सुत्त है। यह लम्बे सूत्रों का संकलन है। इन सुत्रों के आकार दीर्घ हैं इसीलिए इस निकाय को दीघनिकाय कहा गया है।

[4] शान्तिपर्व महाभारत के कुल 18 में से 12वाँ पर्व है। इसमें धर्म, दर्शन, राजनीति और अध्यात्म के ज्ञान का विशद निरूपण किया गया है। इसके अन्तर्गत 3 उपपर्व हैं- राजधर्मानुशासन पर्व, आपद्धर्म पर्व, तथा मोक्षधर्म पर्व । इसमें कुल 365 अध्याय हैं।

[5] महाभारत (पंचम खण्ड) शांतिपर्व, अनुवादक पंडित रामनारायणदत्त शास्त्री, गीताप्रेस, गोरखपुर.

[6] अल्तेकर (2021), स्टेट एण्ड गवर्नमेंट इन एनसिएंट इंडिया, पृष्ठ 27. 

[7] महाभारत (पंचम खण्ड) शांतिपर्व, अनुवादक पंडित रामनारायणदत्त शास्त्री, अध्याय 67.

[8] दीघनिकाय, अनुवादक मौरिस वाल्से (1995), विज़्डम पब्लिकेशन, बॉसटन 

[9] अल्तेकर (2021), स्टेट एण्ड गवर्नमेंट इन एनसिएंट इंडिया.

[10] वहीं, पृष्ठ 29.  

Authored by Prof. Sri Prakash Singh, Director South Campus, Delhi University, Delhi.

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