वैदिक वांगमय काल में राजा के कर्तव्य एवं अधिकार

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भूमिका-  यह कथन सर्वथा स्वीकार्य नहीं है कि वेद युगीन विज्ञ राज्य के किसी व्यवस्थित स्वरूप का विकास करने में असमर्थ थे जिसे प्राचीन अथवा आधुनिक अर्थ में राज्य कहा जा सके १ I पूर्व वैदिक काल में ही लघु राज्य का विकास हो चुका था और उसके साथ ही नृपतंत्र का भी सूत्रपात हो चुका था I राज्य लौकिक तथा मानवीय संस्था मानी जाती थी उसके निरंतर होने की कामना की जाती है २ I व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए राज्य की अनिवार्यता ने राजसत्ता में विश्वास को प्रगाढ़ बना दिया I राजा वरुण के समान धृतव्रत समझा जाता था I वह नैतिक नियम प्रथा एवं परंपराओं का प्रतिपालक था I प्रजा का संरक्षक ३ राजा राष्ट्र का पालक ४ तथा राज्य के उत्तरदायित्व का वाहक था I राज्य की स्थिरता कदायित्व इस पर था इस महत्वपूर्ण स्थिति के कारण देवताओं के समर्थ तथा सत्ता से उसकी शक्ति की प्रतीकात्मक तुलना की जाती थी I आस्था की इसी उच्च भावना के कारण कदाचित पुरुकुल के शासक पुरुकुत्स को जयदेव की उपाधि दी गई पर यह विरुद् राजा के देवत्व का प्रमाण नहीं हो सकता I राज सत्ता लौकिक एवं मानवीय समझी जाती थी I

राजा राज्य का आधार-  राज्य संस्था की अनिवार्यता में राजा को सत्ता सर्वमान्य हो चली थी I वह धर्म संरक्षक समाज का नेता एवं राज्य का आधार था किंतु वास्तविक स्थिति में अभी वह अपनी सत्ता का पूर्ण उपभोक्ता था I उसके अधिकार सीमित थे ५ I राजा की शक्ति अधिक नहीं हुई थी पर राज्य के उत्थान एवं जनजीवन के विकास का दायित्व इस पर था I वरुण तथा इंद्र से संबंधित सूक्त से राज की आंतरिक तथा वाह्य नीतियों का परिचय मिलता है I वरुण को बहुधा राजा की संज्ञा दी गई है ६ I इंद्र को युद्ध का देवता माना गया है I धृतवर्ती राजा धर्म के संरक्षण में प्रजा के नैतिक विकास का ही अधिष्ठाता ना था I उसे प्रजा के हितार्थ अन्य कार्य भी करने पड़ते थे I वरुण की ऋत व्यवस्था के अनुरूप पृथ्वी पर राजा को भी गुप्तचर तथा दूतों के द्वारा राज्य में शांति व्यवस्था रखनी पड़ती थी I निसंदेह यह राजसत्ता की असुरक्षित स्थिति के कारण यह कर व्यवस्था आवश्यक हुई I राजा न्याय का वितरण भी करता है I संभवत राजा दंड विधान का व्यवस्थापन करता था और दंड विधि का भी निर्माण करता था I भूमि पर राजा के स्वामित्व की धारणा अभिव्यक्त नहीं हो सकी थी I भू संपत्ति पर व्यक्तिगत स्वामित्व तथा सिंचाई करने की विधि ज्ञात थी ७ I क्षेत्र के परिमाण निकालने की व्यवस्था थी इन तथ्यों की उपस्थिति से यह संकेत होता है कि राजा व्यवहार संबंधी न्याय भी करता रहा होगा I राज्य के सहयोग के बिना सामाजिक न्याय की व्यवस्था संभव नहीं हो पाती सभा भी न्याय का कार्य करती थी अवश्य उसके कार्य के मूल में राजा ही रहा होगा I यह अप्रत्याशित नहीं है कि राजा प्रायः न्यायाधीश का कार्य करता था वास्तव में वह राज्य विधि का निर्माण नहीं करता था ८ I किंतु राज्य धर्म की संरक्षण अवश्य करता था ब्राह्मणों की सुरक्षा के लिए वह विशेष रूप से उत्तरदाई था  I निर्धन ब्राह्मण की सहायता करना उसका एक प्रमुख कर्तव्य था  I

जनता का संरक्षक-  राजा जनता का संरक्षक था I अतः आंतरिक शांति व्यवस्था एवं सुरक्षा की स्थापना करना मात्र उसका कर्तव्य ना था I युद्ध काल में वह सेना का नेतृत्व करता था इंद्र सूक्त से प्रतिभाषित होता है कि राजा शत्रुओं का मर्दन नहीं करता था I प्रतियुक्त और राज्यों को अपने राज्य में मिलाकर राज्य की सीमा की वृद्धि भी करता था  I राजा राज्य के इन समस्त कार्यों के संपादन में अपने अधिकारियों की सहायता लेता था I उसके प्रमुख अधिकारी पुरोहित सेनानी तथा ग्रामीण थे   I  इस प्रकार पूर्व वैदिक काल में राजसत्ता के सीमित विकास में ही राजा के उत्तरदायित्व गहन थे I सीमित शासन तंत्र का विकास हो चुका था जिसके द्वारा राजा समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति ही नहीं करता था I उसके प्रकाश के लिए उसकी गतिविधियों पर नियंत्रण भी रखता था I राजा की शक्ति एवं दायित्व में क्रमशः वृद्धि होती गई I ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में ही राज्य पद के लिए प्रयुक्त विविध संज्ञाएं इस तथ्य को संकेत करते हैं राजन के अतिरिक्त राजा के लिए प्रयुक्त विविध एक राज अधिकराज सम्राट तथा स्वराज आदि शब्दों को प्रयोग हुआ है I राज्य के स्वरूप और राजा की शक्ति के संबंध में इन संख्याओं की समुचित परिव्याख्या अपेक्षित सूचना के अभाव में नहीं की जा सकती किंतु इतना निश्चित है कि सम्राट राजन की अपेक्षा अधिक शक्ति का उपभोक्ता था I फिर भी इसका अभिप्राय ऐसी राजा से नहीं है जिसने कई राज्यों की विजय कर साम्राज्य की स्थापना की हो I सप्त सिंधु के अधिकांश जनराज्यों अथवा छोटे-छोटे राष्ट्रों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती I संभवत इन छोटे-छोटे राज्यों में जिन राजाओं की शक्ति तथा शौर्य विशेषता या सु्ख्यात हो गए वे स्वयं को सम्राट उद्घोषित कर दिए ९

शासन पद्धतियां-  उत्तर वैदिक काल में विविध राष्ट्रो जनराज्यों या जनपदों के पारस्परिक संघर्ष के कारण महाजनपदों का विकास शुरू हुआ I इन सब में एक ही प्रकार का शासन विद्यमान नहीं था धीरे-धीरे अनेक प्रकार की शासन पद्धतियां भारत के जनपदों में प्रचलित हुई I एतरेय का परिगलन किया गया है इस संदर्भ के अनुसार प्राची दिशा के राज्यों के जो राजा हैं उनका साम्राज्य के लिए अभिषेक होता है और वह सम्राट कहाते हैं दक्षिण दिशा में जो सत्वत राज्य है I वहां का शासक भोज्य है और उसके शासन भोज कहे जाते हैं प्रतिची दिशा का शासन १० प्रकार स्वराज है और वहां के शासक सौराष्ट्र कहते हैं I उत्तर दिशा में हिमालय के क्षेत्र में जो राज्य है वहां वैराज्य प्रणाली है और वहां के शासक विराट कहाते हैं I मध्य प्रदेश के राज्यों के शासक राजा कहे जाते थे I इस प्रकार एतरेय ब्राह्मण में साम्राज्य भोज्य स्वराज व वैराज्य और राज्य इन पांच प्रकार की शान पद्धतियों का उल्लेख हैI  यह विविध प्रणालियां किस-किस क्षेत्र में प्रचलित थी इनका निर्देश भी एतरिय ब्राह्मण में कर दिया गया है I सम्राट वे थे जो वंश क्रमानुगत राजा होते हुए अपनी शक्ति के विस्तार के लिए अन्य राज्यों को मूलोच्छेद करने में तत्पर थे I महाभारत के समय का मगध राजा जरासंध इसी प्रकार का सम्राट था I संभवत भोज्य उन राज्यों की संज्ञा थी जो वंशानुक्रम ना होकर कुछ निश्चित समय के लिए राजा के पद पर नियुक्त किए जाते थे I सतत यादवों में यह प्रथा प्रचलित थी और महाभारत से सूचित होता है कि वासुदेव कृष्ण इसी प्रकार के भोज्य संघ मुख्य थे I स्वराट शासन वे थे जिनकी स्थिति समानों में ज्येष्ठ की होती थी I इन स्वराज्यों में कतिपय कुलीन श्रेणियां का शासन होता था और सब शासन कुलों की स्थिति एक समान मानी जाती थी I सामानों में ज्येष्ठ व्यक्ति को ही विराट के पद पर नियत किया जाता था I संभवत वैराज्य जनपद वे थे जहां जनता अपना शासन स्वयं करती थी और जिनमें कोई राजा नहीं होता था I यह शब्द संभवत गणतंत्र जनपदों का परिचायक है मध्य प्रदेश के पूर्व पांचाल आदि जनपद राज्य कहलाते थे और वहां प्राचीन वैदिक युग की परंपरागत शासन प्रणाली विद्यमान थी I इस युग के राजनीतिक विकास में राज्य समाज की अनिवार्य ही नहीं सर्वोच्च संस्था बन गया और राजा जो राज्य का मूलभूत आधार था I उसका प्रथम प्रतिनिधि था अपने अधिकार की उस सीमा तक पहुंच गया था जहां सत्ता और नियंत्रण उसके सार भूत तत्व थे I समाज के विरोधी तत्वों पर नियंत्रण सामाजिक बंधन की स्थिरता एवं व्यक्ति के पारस्परिक संबंधों के स्थायित्व के लिए राज्य की नितांत आवश्यकता राजशक्ति के विवर्धन के कारण बन गए I

जनता का स्वामी-  इस युग में राज्य सत्ता का परम उत्कर्ष हुआ अथर्ववेद में राजा को योद्धाओं में श्रेष्ठ ऐश्वर्यपति तथा जनता का स्वामी कहा गया है ११ I उसके शेष का आतंक क्रमशः बढ़ता जा रहा था जिसका अभिषेक किया जा चुका है I उसके संबंध में कहा गया है कि वह महान है पृथ्वी अब उससे भय खाती है I  पृथ्वी के भय में समस्त जन पर राजा के द्वारा नियंत्रण की शक्ति ही अभिप्रेत नहीं है I अपितु केंद्रीय भूत राजशक्ति की स्वीकारोक्ति भी जुड़ी है I राजा राज्य के संपूर्ण क्रिया चक्र का केंद्र समझा जाने लगा था I शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि यह तुम्हारा राष्ट्र है तुम इसके नियामक और धारण कर्ता हो १२ I अकेले राजा पर राष्ट्र संवर्धन का यह गुरु दायित्व उसके अपरिछिन्न शक्ति का परिचायक कहा जा सकता है I

अधिकार-  इस युग में समिति जैसी लोक धार्मिक कृत्यों ने राजनीतिक आवश्यकता में राजा के अधिकारों का निर्धारण कर दिया I राजस्व के प्रसंग में उल्लेखित 11 रत्नि राष्ट्र संगठन के अंग थे I कुछ विद्वानों का मत है कि यह सत्नीगण समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि थे इनमें पुरोहित सेनानी राजन्य ग्रामीण तथा पालगल जो शूद्र जाति का होता था I कदाचित वर्ग विशेष के प्रतिनिधि के रूप में स्वीकृत हो सकते थे किंतु प्रश्न यह है कि क्या यह रत्नीगढ़ राजसत्ता को मर्यादित करने में समर्थ थे I अभिषिक्त राजा सिंहासनारोहन से पूर्व प्रत्येक रत्नी के घर जाकर उसे रत्न हवि देता था और सब रत्नियों से यह कहता था कि हम तुम्हारे लिए ही इस प्रकार अभिषिक्त होते हैं और तुम्हें अपना निष्ठ अनुगामी बनाते हैंI  १३ इन रत्नियों के प्रति जो राज्य के उच्च अधिकारी तथा समाज के प्रतिनिधि स्वरूप थे I राजा की यह अनुनय पूर्ण घोषणा उसके किसी निरंकुश प्रयास पर प्रतिबंध रही होगी यह प्रतिबंध समाज का था I उस जनसाधारण का था जो संप्रभुत था सामाजिक संगठन का आधार जनजाति अथवा प्रजातिपरक नहीं था  I उसका स्वरूप सामाजिक और राजनीतिक बन चुका था  I  किसी व्यवस्था की स्थापना राजा स्वयं ही कर सकता था I जब राजा प्रथम बार राज सिंहासन पर बैठता है तब पुरोहित उससे कहता है कि कृषि कर्म के लिए कल्याण के लिए समृद्धि के लिए पोषण के लिए राज्य तुम्हें दिया जाता है १४ I अतः शासन के लिए जनता राज्य स्थानांतरित करती है राजा के पास राज्य धरोहर के रूप में रहता है I सिद्धांत में जनता में संप्रभुता निहित थी और राजा शासन का कार्यकारिणी प्रधान था ऐसी स्थिति में राजा की निरंकुश्ता को कम अवसर प्राप्त था I राजत्व के आधार पर जन स्वामित्व के विधान का संगठनात्मक महत्व था और उस विधान की अपेक्षा सरल ना थी अवश्य इसमें नैतिक बल विशेष था I अतः वैदिक साहित्य में निरंकुश तथा आतताई शासको के भी प्रमाण मिलते हैं I अथर्ववेद में उल्लेखित है कि धार्मिक राजा के राज्य में वर्षा नहीं होती उसे सीमित तथा मित्र वर्ग का सहयोग प्राप्त था I राष्ट्र के साधनों का केवल अपने लिए निरंकुश्ता पूर्वक प्रयोग करने वाले राजा को राष्ट्रीय कहा गया है  I साथ ही साथ ऐसा भी उल्लेख है कि जिस प्रकार यव को मृग खा जाता है I अत्याचारी राजा प्रजा का भक्षण कर लेता है शिकारी जिस भांति किसी पुष्ट पशु का वध कर लेता है उसी प्रकार स्वेच्छाचारी राजा प्रजा का हरण कर डालता है १५ I अवश्य ही कुछ शासको ने सुरक्षाचारी बनने का प्रयास किया होगा I

धर्म रक्षक-  सामान्यतया राजा दैवी पुरातन नियमों तथा सामाजिक परंपराओं का अतिक्रमण नहीं करता था I विधि नियम अपने मानवीय आधार में भी अनादि अथवा दिव्य माने जाते थे I जिनका पालन करना राजा का अनिवार्य कर्तव्य था I धर्म से बढ़कर कोई वस्तु नहीं अतः धर्म का पालन राजा का नित्य व आवश्यक कर्तव्य था  I राजा वरुण की भांति धर्मपति विधि नियम अथवा प्रथा परंपराओं का रक्षक था १६ वह स्वयं विधि का निर्माण नहीं था समाज विधि का स्रोत था I अतः विधि के कारण जन के शोषण की परिस्थितियां सीमित हो जाती थी  I राजा से अपेक्षा ही की जाती थी कि धर्म तथा वाणी में वह सत्य होगा धर्म का अन्तस्तत्व सत्य है और धर्म क्षत्र का क्षत्र है I अतः राजा धर्म की परिधि में बड़ा था धर्म की विधि नियम राजा के अधिकार को सीमित कर देते थे I राजसूय के एक कृत्य में कुछ इसी आशय का एक विधान उल्लेखित है अभिषेक के पश्चात राजा के सिंहासन रूण हो जाने पर पुरोहित राजा की पीठ पर एक दंड से बड़ी मृदुलता पूर्वक स्पर्श कर देता था I घोषाल का कथन है कि इस प्रतीकात्मक अनुष्ठान के द्वारा राजा न्याय के समक्ष आदरणीय हो जाता है १७ I जायसवाल का मत है कि यह दंड न्याय दंड का सूचक है I जिससे यह भाव व्यक्त होता है कि राजा धर्म या कानून से ऊपर नहीं प्रतियुत् उसके अधीन है  I भाष्यकार भी यही कहता है कि राजा वध दंड से परे है यह विश्लेषण युक्त युक्त है क्योंकि उसे नृपतंत्रीय संगठन में कोई सार्वजनिक विधायनी संस्था नहीं थी जो राजा को विधानतः दंड देता I राजा राज्य का सर्वोच्च सत्ताधारी था पर वह धर्म के अधीन था देश की सामान्य विधियां सर्वोपरि थी I क्षत्र धर्म के उद्देश्य की सीमा थी धर्म पालन धर्म की यही सीमा व्यवहार में अनियंत्रित राज सत्ता का परिसीमन कर देती थी I

निष्कर्ष-  राजा वास्तव में राष्ट्रभृत्य समझा जाता था १८ I वह पृथ्वी से भय खाता था कि वह कहीं से पदच्यूत कर दे  Iराजा इस भय के कारण जनहित के कारण सहज ही अपेक्षा नहीं कर सकता था १९ I वह कहता है पृथ्वी तू मेरी माता है ना तू मेरी हत्या कर न मैं तेरी करूं २० I राजसत्ता तथा जन अधिकार का यह सामंजस्य अंततः सीमित राजसत्ता का परिभाषी बन गया  I

संदर्भ ग्रंथ

१-शर्मा आस्पेक्ट ऑफ पॉलीटिकल आईडियाज पृष्ठ 266

२-ऋग्वेद 10.176.4

३-वही 3.43.5

४-वही 10.173

५-कुछ राज्यों में राज तत्त्व के आधार में निर्वाचन की परंपरा सभा तथा जनसाधारण की संस्था समिति का राजा पर प्रतिबंध एवं अनियमित कर के कारण ना तो राजा की स्थिति अधिक दृढ़ थी और ना उसकी शक्ति ही अपरिमित थी

६-वही 5.5.8

७-ऋग्वेद 7.49.2

८-वैदिक इंडेक्स

९-वैदिक इंडेक्स खंड 2 पृष्ठ 433

१०-सौराष्ट्र कच्छ सौवीर

११- अ वे 4.22

१२- इंद ते राष्ट्र यन्तासि यमनों ध्रुवों सि धरुण - शतपथ ब्राह्मण 5.2.25

१३- जायसवाल पूर्व पृष्ठ 33 पर उद्धृत

१४- कृष्यै त्वा क्षेत्राय त्वा राये त्वां पोषयत्वा - शतपथ ब्राह्मण 5.2.1.15

१५-शतपथ ब्राह्मण 13.2.3.8

१६-वही 5.4.4.5

१७-घोषाल हिस्टोरियॉग्राफी एंड अदर एसेस पृष्ठ 369

१८-अ वे 19.37.3

१९-शतपथ ब्राह्मण 5.4.3.21

२०- पृथिवी मातर्मा हिसीमां हत्वाम इति - वही 5.4.3.20

Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.

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