वैदिक वांगमय काल में सभा और समिति

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भूमिका-  वैदिक युग में राष्ट्र का शासन राजा अकेला नहीं कर सकता था अपितु उसकी सहायता के लिए सभा और समिति नाम की दो संस्थाओं की सत्ता भी थी I समिति संपूर्ण विषय की संस्था थी ग्रीस के प्राचीन नगर राज्यों में से अनेक ऐसे थे जिसके सब वयस्क नागरिक नगर राज्य की समिति में एकत्र होकर अपने राज्य के लिए कानून बनाते थे और राजकीय नीति का निर्धारण करते थे I वैदिक युग की समिति भी एक इस प्रकार की संस्था थी जिसमें संपूर्ण विश: एकत्र होते थे यह भी संभव है कि अनेक राष्ट्रों की समितियां में सब वयस्क नागरिक न सम्मिलित होते हो और उनका एक विशिष्ट वर्ग १ ही उसमें शामिल होता हो यजुर्वेद का एक मंत्र है -

यत्रोषधीः समग्मत राजानः समितविव

विप्रः स उच्यते भिषग्रक्षो हामीव चातनः - यजुर्वेद 12/80

इस मंत्र में यह निर्देश मिलता है कि समिति में राजन: एकत्र होते थे I यह राजन: वही है जिन्हें वेद में अन्यत्र राजन: राजकृत: कहा गया है I अर्थात वे राजा या राजन्य जो राजा को बनाते हैं I

अथर्ववेद के एक मंत्र में राजा यह प्रार्थना करता है -

सभा च मा समितिशचावतां प्रजापतेर्दुहितरौसंविदाने

येता समच्छा उपमा स शिक्षाच्चारू बदानि पितरः संगतेषु - अथर्ववेद 7/1

इस मंत्र से यह बात निर्दिष्ट होती है I सभा और समिति नामक संस्थाएं प्रजापति की दूहिताएं हैं उन्हें राजा ने नहीं बनाया अपित वे ईश्वरीय विधान की परिणाम है I वे राजा की रक्षा करती हैं और उसे समूचित परामर्श देने का कार्य करती हैं  I उनमें पितर एकत्र होते हैं जो वहां समुचित रूप से भाषण देने का कार्य करते हैं I सभा और समिति नामक संस्थाओं का उल्लेख वैदिक साहित्य में अन्यत्र भी अनेक स्थलों पर आया है I एक मंत्र में कहा गया है -

सभ्य सभा में पाहि ये च सभ्या सभासदः - अथर्व० 19/ 55 /6

अन्यत्र सभा समिति और सेना का एक ही मंत्र में उल्लेख किया गया है I एक मंत्र में प्रार्थना की गई है की सभा के सभासद सवाचस हो उनकी वाणी एक हो वह परस्पर विरोधी बातें ना करके सवाचस होकर कार्य करें I

सभा और समिति का स्वरूप-  सभा और समिति नामक संस्थाओं के स्वरूप पर अथर्ववेद के एक सुक्त में बहुत उत्तम प्रकाश पड़ता है I यह सूक्त इस प्रकार है निश्चय ही पहले विराट दशा थी I इस दशा के उत्पन्न होने के कारण सब डरे हुए थे कि क्या सदा यही दशा रहेगी इस विराट दशा में उत्क्रांती हुई इस विराट दशा गार्हपत्य दशा में उतरी यह गार्हपत्य संगठन में भी उत्क्रांती हुई और यह गार्हपत्य  दशा आहवनीय दशा के रूप में परिणत हुई I इस आहवनीय संगठन में भी उत्क्रांती हुई जिसे दक्षिणग्नि की दशा आई जो कोई यह जानता है I वह बस्ती में निवास के योग्य है इस दक्षिणग्नि दशा में भी उत्क्रांती हुई और सभा की दशा आई जो कोई जानता है वह सभा का सदस्य बनता है I  सभा की इस दशा में भी उत्क्रांती हुई और समिति की दशा आई  जो कोई यह जानता है वह समिति का समिति बनता है I इस समिति दशा में भी उत्क्रान्ति हुई और आमंत्रण की दशा हुई जो यह जानता है वह आमंत्रण का आमंत्रणीय बनता है ३  I

अथर्ववेद के इस सूक्त में मानव समाज और उसके संस्थाओं के क्रमिक विकास का बड़े सुन्दर व स्पष्ट रूप से वर्णन है I पहले विराट अराजक दशा थी जिसे सब लोग भयभीत वह आसंकित हो गए महाभारत में भी इसी विचार को प्रकट किया गया है इस दिशा में उत्क्रांती होकर सबसे पहले गार्हपत्य दशा आई I लोक परिवार के रूप में संगठित हुए मानव समाज का सबसे पहले संगठन परिवार ही है जिसमें पति-पत्नी व संतान एक संगठित व मर्यादित जीवन व्यतीत करते थे I गार्हपत्य व पारिवारिक संगठन में उत्क्रांती होकर आहवनीय  दशा आई  I आहवनीय शब्द का अभिप्राय एक ऐसे संगठन से है जिसमें  बुलाया जाए आवाहन किया जाए I संभवतः यह ग्राम के संगठन को सूचित करता है जिसमें विविध कुलों के कुल मुख्यों को आवाहन द्वारा एकत्र किया जाता है I आहवनीय संस्था के बाद दक्षिणाग्नि संस्था का विकास हुआ I दक्षिण का अर्थ चतुर है और अग्नि की अग्रणी निरुक्त में अग्नि की नियुक्ति अग्रणी रूप में हुई है ४ I  इस संस्था में संभवत ग्राम के चतुर अग्रणी एकत्र होते हैं I यह ग्राम की अपेक्षा अधिक बड़े संगठन को सूचित करता है I जो संभवतः जनपद या राष्ट्र का ऐसा संगठन था I जिसमें ग्रामों के योग्य नेता एकल होते थे  I इसके बाद सभा और समिति नामक संस्थाओं का विकास हुआ जो राष्ट्रीय जनपद की ही संस्थाएं थी I राष्ट्र का ही एक और अधिक बड़ा संगठन था जिसे आमंत्रण कहते थे I आमंत्रण शब्द ही इस बात को सूचित करता है कि इसमें सम्मिलित होने के लिए बड़ी संख्या में लोगों को निमंत्रित किया जाता है I

वेद के इस सूक्त का बहुत अधिक महत्व है I संभवतः यह प्राचीनतम संदर्भ है जिसमें राज्य संस्था की उत्पत्ति और विकास पर विचार करने का प्रयत्न किया गया है I वर्तमान समय के विचारक भी मानव समाज व राज्य के प्रादुर्भाव व विकास का प्रायः यही क्रम मानते हैं I सबसे पहले परिवार संगठित हुए फिर ग्राम जन और जनपदों का संगठन हुआ I दक्षिण अग्नि और आमंत्रण जैसे शब्दों का क्या अभिप्राय है  I यह भलीभांति स्पष्ट नहीं है पर सभा और समिति स्पष्ट ही ऐसी संस्थाएं थी जिनका उल्लेख वैदिक साहित्य में अनेक स्थानों पर आया है I अथर्ववेद में इन संस्थाओं के निर्दिष्ट करने वाले मंत्र आए हैं I ऋग्वेद के एक मंत्र में यह कहा गया है कि तुम अपने घर को भद्र बनाओ तुम्हारी वार्ण भद्र हो और तुम चिरकाल तक सभा में रहो ५ I एक अन्य मंत्र में यह शब्द आए हैं वह सदा सभा में जाते हैं ६ I एक मंत्र में सभी मित्र का उल्लेख है ७ जिससे सूचित होता है की सभा के सदस्यों को सभेय कहा जाता है I जहां मनुष्य एकत्र होते हों ऐसे समूह को वह सभा नहीं कहते है वह एक सुसंगठित संस्था थी जिसके सदस्य स भेय कहते थे I ऋग्वेद के एक मंत्र में कहा गया है कि जुआ खेलने वाले सभी में जाते हैं यह समझते हुए कि हम ही विजई होंगे वहां उनके पास बिखरे रहते हैं I ऋग्वेद के समय के भारतीय राष्ट्रो व जनपदों में सभा नाम की संस्था भली-भांति विकसित हो चुकी थी I यह बात भरोसे के साथ कहीं जा सकती है I

सभा और समिति में भेद-  सभा के समान समिति का भी ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर उल्लेख है I एक मंत्र में राजा के समिति में शामिल होने के लिए जाने का निर्देश किया गया I सभा और समिति में क्या भेद था यह वैदिक साहित्य से स्पष्ट नहीं होता पर वैदिक मंत्रों का अनुशीलन कर विद्वान इस परिणाम पर पहुंचे हैं कि समिति सभा की तुलना में एक बड़ी संस्था थी और यह माना जाता था कि वह संपूर्ण विषय या प्रजा का प्रतिनिधित्व करती है I संभवतः राष्ट्र के अंतर्गत सब ग्रामों के ग्रामीण उसमें सम्मिलित होते थे और साथ ही विष: के कतिपय प्रमुख व्यक्ति सूत रथकार व अन्य शिल्पी आदि उनमें उपस्थित होते थे I राजा भी समिति में उपस्थित होता था समिति के पति अध्यक्ष को ईशान कहते थे सभा समिति की अपेक्षा छोटी संस्था थी और उनमें कतिपय विशिष्ट व्यक्ति ही सम्मिलित होते थे I राष्ट्र के प्रधान न्यायालय का कार्य भी सभा द्वारा ही किया जाता था I

सभा और समिति के सदस्य - यह आवश्यक समझा जाता था की सभा और समिति के सदस्य परस्पर सहयोग से काम करें उनके मत एक हो उनकी वाणी एक हो उनका विचार विमर्श एक समान हो और वह एक ही मंत्र का निर्धारण करें I ऋग्वेद के अंतिम सूक्त में यह मंत्र संभवत सभा और समिति के सदस्यों के लिए ही लिखे गए हैं -

संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनासि जानताम

देवा भागं यथा संजानाना उपासते

ऋृग्वेद 10/191 / 2 -4

यह मंत्र इस बात में कोई संदेह नहीं रहने देते की वैदिक काल के राष्ट्रो में सबका एक मत होना बड़े महत्व की बात समझी जाती थी I सभा और समिति जैसी संस्थाओं में जो लोग सम्मिलित हो यदि उनके मन चित्त और हृदय एक ना हो वह परस्पर विरोधी बातें कहते हो तो वह कभी किसी समुचित निर्णय पर नहीं पहुंच सकते I इसलिए उनके लिए समान मन और समान विचार वाले होने की बात को इतना महत्व दिया गया है I

सभा और समिति में विचार विमर्श-  सभा और समिति नामक संस्था में विभिन्न विषयों पर विचार विमर्श व वाद विवाद हुआ करता था और उनके सदस्य अच्छे वक्ता होकर दूसरे को अपने अनुकूल बनाने के लिए भी प्रयत्नशील रहा करते थे इसलिए अथर्ववेद में यह प्रार्थना की गई है कि -

एषामहं समासीनानां वर्चो विज्ञानमाददे

अस्याः सर्वस्याः संसदों मामिन्द्र भगिनं कृणु - अथर्व 7 / 12 - 3 -4

इन मंत्रों के अनुशीलन से इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाता की वैदिक युग की सभा समितियां में विविध वक्ता अन्य सदस्यों को अपने अनुकूल करने के लिए प्रयत्नशील रहते थे और उनमें विविध विषयों पर विचार विमर्श द्वारा एकमत होने का यंत्र किया जाता था I इसी कारण राजा की ध्रुव  रूप से सत्ता के लिए समिति का उसके अनुकूल होना आवश्यक माना जाता था ८ और यह स्वीकार किया जाता था कि जो राजा स्वेच्छाचारी होने का यत्न करें समिति भी उसके अनुकूल होकर नहीं रह सकती ९ I सभा नामक संस्था में न्याय संबंधी कार्य विशेष रूप से होते थे इस संबंध में भी कतिपय वैदिक मंत्र उल्लेखनीय है I अथर्ववेद में सभा को नरिष्ठ कहा गया है जिसकी व्याख्या सायणाचार्य ने इस प्रकार की है जहां बहुत से एकत्र होकर एक बात कहें उसका उल्लंघन दूसरों को नहीं करना चाहिए क्योंकि यह अनतिलंध्य है १० I इसी कारण इसे नरिष्ट कहते हैं ११ I सभा के नरिष्ट विशेषण से स्पष्ट है कि इसके निर्णय का अतिक्रमण कर सकता कदापि संभव नहीं था I ऋग्वेद में सभा का एक विशेषण किल्विष स्पृत दिया गया है १२ जिसका अर्थ है पाप या अपराध का परिमार्जन करने वाली सभा में न्याय करते हुए उसके सभासदों द्वारा कदाचित अन्याय या पाप हो जाने की संभावना भी बनी रहती थी I इसलिए यजुर्वेद में मंत्र द्वारा सभा में किए गए पाप से मुक्ति की प्रार्थना की गई है १३  I

निष्कर्ष-  उपरोक्त के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वैदिक युग में राज्यों में सभा और समिति नामक संस्थाओं की सत्ता थी I जिसका राज्य के शासन में महत्वपूर्ण भाग होता है I समिति संपूर्ण विश: की संस्था थी जो राजा का वर्णन करती थी और जिसमें राजकीय विषयों पर जनता की सम्मति प्रकट की जाती थी I सभा में जहां न्याय कार्य होता था वहां साथ ही उनमें एकत्र पितर या कुलमुख्य राजा को महत्वपूर्ण विषयों पर परामर्श देने का भी कार्य किया करते थे I

संदर्भ ग्रंथ

१-यजुर्वेद का एक मंत्र है जिसके पास औषधीयां इस तरह से एकत्रित होती हैं जैसे कि समिति में राजनाः उसी विप्र  को भिषक कहते हैं

२-सभा मेरी रक्षा करें उसके जो सभ्य सभासद है वह मेरी रक्षा करें -अथर्ववेद 19.15 5.6

३-अथर्ववेद 8.10.1

४-निरुक्त दैवत् कांड 7.4

५-ऋग्वेद 6.28.6

६-ऋग्वेद 8.4.9

७-ऋग्वेद 1.24.13

८-अथर्ववेद 6.8

९-अथर्ववेद 5.19.15

१०-अथर्ववेद 6.12.2

११-ऋग्वेद 10.71.10

१२-यजुर्वेद 20.17

Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.

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