शुक्रनीति में राजा की शक्तियों पर प्रतिबंध

From enIKSwiki
Jump to navigation Jump to search

भूमिका

शुक्रनीति में राजा को इतनी व्यापक शक्तियां प्रदान की गई हैं, जिससे उसका पद अति महत्वपूर्ण हो गया है I फलतः राजा की स्थिति एक निरंकुश शासक जैसी प्रतीत होती है I  वास्तव में महर्षि शुक्र ने निरंतर राजतंत्र की कल्पना तक नहीं की I अपठित राजतंत्र के निरंकुश रूप को समाप्त करने के उद्देश्य से उन्होंने प्रारंभ से ही राजा की शक्तियों पर ऐसे नियंत्रण की व्यवस्था की जिससे कि उसकी प्रवृत्ति निरंकुशता की ओर प्रवृत्त ना होने पाए I इसी उद्देश्य को दृष्टिगत करते हुए संभवत महर्षि शुक्र ने यह आशा की कि राजा एक साधारण व्यक्ति नहीं अपितु सर्वगुण संपन्न होगा I इस प्रकार सर्वगुण संपन्न राजा की कल्पना में शुक्रनीति कार ने उसकी भी शिक्षा पर विशेष बल दिया है I  उन्होंने राजा बनने के पश्चात सदैव अन्वीक्षिकी १ ,त्रई२ ,वार्ता ३, दंडनीति ४ ,आदि चारों विद्याओं के भली भांति अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया है ५ I  चूकी महर्षि शुक्र इस तत्व से परिचित थे कि अन्वीक्षिकी विद्या आत्मज्ञान कराती है जिसके कारण हर्ष तथा शोक नहीं होता६ I त्रयी के अध्ययन से राजा यथा विधि कार्य करता है ७ I वार्ताशास्त्र के ज्ञान से जीविका संबंधी भय व्याप्त नहीं होता ८ एवं दंड नीति का अध्ययन प्रजा को धर्मरत करने में सहायक होता है ९ I

राजा की योग्यता

आचार्य शुक्र ने राजा को संपूर्ण विद्याओं में पारंगत बनाने के उद्देश्य से शिक्षा को राजा के जीवन का अनिवार्य अंग सा बना दिया है I शुक्र की मान्यता रही है कि जिस प्रकार शरीर के अस्तित्व के लिए भोजन की अनिवार्यता है ठीक उसी प्रकार राजा के लिए नीति शास्त्र का ज्ञान होना अनिवार्य है १० I आचार्य शुक्र का विश्वास है की नीतिज्ञ राजा के शत्रु नहीं होते ११ एवं उसे किसी प्रकार दुख नहीं भोगना पड़ता १२ I साथ ही उसके घर में लक्ष्मी का निवास रहता है १३ I अतः ऐसा राजा नीति कल्याण कारक १४ एवं सुख समृद्धि दाता होता है I इस प्रकार शुक्र नीतिकार ने राजा के लिए नीतिशास्त्र का ज्ञान होना अनिवार्य मानते हुए १५ संपूर्ण शासन व्यवस्था का संचालन नीतिशास्त्र अनुसार करने का अधिकार दिया १६ I अतः स्पष्ट है कि उनका विश्वास राजा का आचरण नीति मुक्त रखने में नहीं अपितु नीति युक्त रखने में ही था १७ I

राजा का आचरण  

मुक्त शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत भी राजा से यह आशा की जाती है कि वह शासन संचालन के संपादन में धर्मानुकूल आचरण ही करेगा I क्योंकि राजा स्वयं लोगों के धर्म निश्चित आचरण करने पर ही प्रजाएं अपने-अपने धर्म में रत रहती है १८ I अतः महर्षि शुक्र ने स्वधर्म पालन को परमतप मानते हुए २९ ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर २० धर्माचरण की व्यापक महत्व प्रतिपादित की है २१ I उनका विश्वास है कि जिस राज्य को प्रजा स्वधर्म लीन रहती है उसका राजा स्थाई कीर्ति का भोग करने वाला होता है २२ I इसलिए शास्त्र आदि से त्याज्य विषयों को बुद्धिमान राजा को कभी ग्रहण नहीं करना चाहिए २३ I

    संपूर्ण राजधर्मों की रक्षा में लीन नीच राजा भी श्रेष्ठ को प्राप्त हो जाता है २४ I इस विवेचन से स्पष्ट होता है कि शुक्रनीति के  राजा से यह आशा की जाती है कि वह मनमाने तरीके से नहीं अपितु धर्म अनुकूल आचरण करेगा I उचित शिक्षा एवं धर्म अनुकूल आचरण के साथ ही साथ राजा की व्यापक शक्तियों पर प्रतिबंध के उद्देश्य से महर्षि शुक्र ने राजा को यह निर्देश दिया है कि वह अपने राज्य कार्यों के संपादन में मंत्रिपरिषद एवं अधीनस्थ अधिकारियों की सहायता से कार्य करेगा I २५आचार्य शुक्र ने इसका कारण स्पष्ट करते हुए लिखा है कि यदि राजा मंत्रिपरिषद की  मंत्रणा के बिना कोई कार्य करता है तो उस राजा के राज्य का नाश हो जाता है I अतः मंत्रिपरिषद को सदैव श्रेष्ठ सलाह देने वाला होना चाहिए २६ I

    मंत्रिपरिषद का भय राजा के दिल में बना रहना राज्य की वृद्धि के लिए आवश्यक है यदि राजा मंत्रिपरिषद से नहीं डरता तो ऐसे मंत्रिपरिषद का कोई अस्तित्व नहीं है I केवल इतना ही नहीं राजा द्वारा नीति विरुद्ध आचरण किए जाने पर शुक्र नीतिकार ने मंत्रिपरिषद को यहां तक अधिकार दिया है कि वह उसे राजपद से हटाकर २७ उसके स्थान पर अन्य नीतिज्ञ राजा को नियुक्त करें I  

    इन तथ्यों से स्पष्ट है कि शुक्रनीति की शासन व्यवस्था में राजा की स्वेच्छाचारी ढंग से नहीं अपितु मंत्रिपरिषद एवं अधीनस्थ कर्मचारियों की सहायता तथा मंत्रणा से ही कार्य करेगा I जहां एक और राजा की शक्तियों पर मंत्रिपरिषद को सलाह से कार्य करने का नियंत्रण रखा है वहीं दूसरी ओर उसके लिए परंपराओं एवं रीति रिवाज का ध्यान रखना भी आवश्यक माना गया है I राजा को लौकिक कार्यों में लोक के रीति रिवाज एवं परंपराओं का अनुसरण करते हुए २८कभी भी देश कुल जाति और सज्जन आदि के जो भी धर्म हो उनकी निंदा एवं समर्थवान होते हुए भी उसके लौकिक आचारों का उद्देश्य पूर्वक उल्लंघन नहीं करना चाहिए I चूँकि धर्म युक्त लोक निन्दित कार्य नरक में ले जाने वाले होते हैं I अतः महर्षि शुक्र का मत है ऐसे कार्य भी राजा को नहीं करने चाहिए शुक्रनीति कार की मान्यता यह रही है कि लोक एवं शास्त्र के त्याज्य विषयों को जानकर एवं उन्हें छोड़कर बुद्धिमान व्यक्तियों को प्राचीन लोगों के द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों के अनुरूप ही कार्य करना चाहिए २९ I

    शुक्र नीति के वर्णन से प्रतीत होता है कि राजा के निरंकुश ना होने का एक बहुत बड़ा कारण जनता का भय है I महर्षि शुक्र ने राजा का दायित्व निश्चित किया है कि वह गुप्त चरों के माध्यम से अपने बारे में प्रजा की क्या धारणा है इसका पता लगाते रहें I यदि प्रजा उनकी निंदा करती है तो कभी प्रजा का तिरस्कार एवं उसे दंड न दे अपितु स्वयं श्रेष्ठ आचरण युक्त व्यवहार करें उनका विचार है कि जो राजा निंदा करने वाले प्रजा को पीड़ा पहुंचना है तो प्रजा उनसे क्षुब्ध होकर उसे छोड़ देती है ,क्योंकि जिस प्रकार अनेक लटों की रस्सी सिंह आदि बलवानों को खींच लाने में समर्थ होती है उसी प्रकार बहुमत का निर्णय भी राजा से अधिक बलवान होता है I अतः आचार्य शुक्र ने प्रतिपादित किया है कि जनमत का भय मानते हुए राजा को निर्धारित कर्तव्यों के अनुकूल आचरण करना चाहिए I

    जनमत के अंकुश के साथ-साथ महर्षि शुक्र ने राजा पर अनेक प्रकार के सामाजिक प्रतिबंध लगाए हैं I शुक्रनीति में सामाजिक प्रतिबंधों की व्यापक रूप से व्याख्या प्रस्तुत की गई है I यद्यपि शुक्र ने अपने ग्रंथ के अध्याय 3 में राजा और प्रजा दोनों ही के लिए सामान्य व्यवहार की नीतियों का प्रतिपादन किया है ३१ I लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि शुक्र नीति को राज्य व्यवस्था का राजा सामाजिक व्यवहार एवं व्यवहारिक आचरण में किसी भी प्रकार की छूट प्राप्त करके समाज विरोधी कार्य न कर सकेगा I

निष्कर्ष  

महर्षि शुक्र ने राजा के जीवन को सामाजिक नियमों के बंधन में इतना बांधा है कि उसके जीवन के सामान्य आचरण एवं व्यवहार के लिए भी नियम प्रतिपादित कर दिए हैं I भोजन करते हुए रास्ता चलना , हंसते हुए बातें करना, बीती हुई बात या मरे हुए व्यक्ति के विषय में शक करना, अपने लिए किए हुए कार्य को स्वयं प्रशंसा करना, एवं बाल ,दाढ़ी ,मूछ, नाखून, आदि बढ़ाना पैर, कान, नाक ,आंख, मुख, ३२ को स्वच्छ ना रखने आदि जैसे सामान्य विषयों पर भी प्रतिबंध लगाए हैं I इस प्रकार आचार्य शुक्र ने राजा के जीवन को नियमित करने के उद्देश्य से उसके लिए समाज में रहन-सहन से सामान्य नियमों ३३ का प्रतिपादन करते हुए उनके दैनिक जीवन के लिए एक कार्यक्रम निश्चित किया है I जिसके अंतर्गत ही उसकी दिनचर्या रहेगी ३४  I आचार्य शुक्र का मत है कि ऐसा करने वाला राजा कभी सुखोपभोग से वंचित नहीं हो सकेगा I इसके अतिरिक्त उन्होंने यह भी प्रतिबंध लगाया है कि निर्धारित कार्यक्रम के अतिरिक्त उसे स्त्री व्यसन एवं मद्य सेवन में व्यर्थ समय नष्ट नहीं करना चाहिए I उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि शुक्र नीति में वर्णित समाज राजा को व्यापक शक्तियां देने के साथ-साथ उससे यह अपेक्षा भी करता है कि वह उन समस्त शक्तियों का उचित एवं उपयुक्त रीति से ही प्रयोग करें I इस प्रकार शुक्र ने जहां एक और राजा को व्यापक शक्तियों का भोक्ता बनाया है वहीं दूसरी ओर विभिन्न प्रकार के अवरोधों के माध्यम से उसे नियंत्रित भी कर दिया है I

संदर्भ ग्रंथ

१-शुक्रनीति 1.153

२-शुक्रनीति 1.115

३-शुक्रनीति 1.156

४-शुक्रनीति 1.157

५-शुक्रनीति 1.152

६-शुक्रनीति 1.158

७-शुक्रनीति वही

८-वही 1.156

९-वही 1.157

१०-शुक्रनीति 1.1

११-शुक्रनीति 1.13

१२-वही 1.16

१३-वही 1.151

१४-वही 5.60

१५-वही 1.3

१६-वही 1.6 एवं 14

१७-वही 5.21 एवं 23

१८-वही 4.3-08

१९-वही 1.24

२०-वही 1.68

२१-वही 1.69

२२-वही 4-3/5

२३-शुक्रनीति 3.36

२४-शुक्रनीति 4-7/425

२५-शुक्रनीति 2/3

२६-शुक्रनीति 2.81

२७-शुक्रनीति 2/274-275

२८-शुक्रनीति 3/33

२९-वही 3/324 - 325

३०-वही 1/131-132

३१-शुक्रनीति 3/1

३२-वही 3/3

३३-शुक्रनीति 3/4

३४-शुक्रनीति 1/275 एवं दृष्टव्य- बेनी प्रसाद- 248 -249 और तुलनीय- आचार्य कौटिल्य ने भी राजा के लिए एक दैनिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया है I जिसके अंतर्गत ही राजा को कार्य करने का निर्देश दिया गया है I कौटिल्य अर्थशास्त्र पृष्ठ 74-78

Authored by Prof. Dr. Bhiplav, Chandrakanta Mahavidyalaya, Sikandradrabad, Uttar Pradesh.

Published by,