सोमदेव सूरी का राजनीतिक चिंतन

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न्याय व्यवस्था- प्राचीन राज्यशास्त्रकारों के समान सोमदेव ने भी न्यायालय की स्थापना की और कार्य पद्धति का संपादन आदि के लिए विस्तृत विवरण दिया है I इस संबंध में निम्न तथ्य द्रष्टव्य हैं- विवादों के मूल कारणों की खोज, विधि के अनुसार दंड का निर्धारण ,विधि के अनुसार कार्य का संपादन, आदि के लिए न्यायालय की स्थापना होना आवश्यक है I न्यायालय के प्रकारों का स्पष्ट उल्लेख न करके भी सोमदेव ने चार प्रकार के न्यायालय का संकेत किया है-

१-ग्राम न्यायालय-ग्राम न्यायालय का पृथक वर्णन न करके भी सोमदेव ने कहा है कि ग्राम न्यायालय में निर्धारित विवादों को पुनर्विचार के लिए राजा के समक्ष ले जाया जा सकता है I राजा का निर्णय अंतिम होता है १ इससे ग्रामों में न्यायालय की स्थापना का संकेत मिलता है I

२- पुर न्यायालय-सोमदेव ने पुर न्यायालय के संबंध में कहा है कि उनके निर्णय को पुनर्विचार के लिए राजा के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए I राजा का निर्णय अंतिम होता है I २ परंतु इन न्यायालय की कार्य पद्धति पर प्रकाश नहीं डाला गया है I

३- सभ्य न्यायालय-सोमदेव के अनुसार सभ्य न्यायालय एक महत्वपूर्ण संस्था है I इसमें नियुक्त किए जाने वाले शब्दों की स्मृतियां अन्य शास्त्रों और व्यावहारिक पक्ष को जानने वाला प्रतिभाशाली होना चाहिए I वह छल से रहित ,स्पष्ट ,और यथार्थ बात कहे अन्यथा वे राज्य के शत्रु है सभ्य न्यायालय का एक सभापति होता है  I ३

४-राजा का न्यायालय- राजा का न्यायालय सर्वोच्च अधिकारी है I अन्य न्यायालय के पुनर्विचार के लिए उच्च न्यायालय में प्रस्तुत हो सकते हैं और राजा का निर्णय अंतिम होता है I ४ प्राचीन आचार्य के समान ही सोमदेव ने भी विवादों के निर्णय के लिए चार प्रकार के प्रमाण कहे हैं Iभुक्ति ,साक्षी, शासन, और शपथ

कोष- राज्य के साथ अंगों में कोष परम उपयोगी है I वह राज्य के जीवन का हेतु है इस संबंध में निम्न तत्व ज्ञान देने योग्य है -

   कोष के द्वारा संपत्ति और विपत्ति दोनों समयों में सेना की वृद्धि होती हैI कोष संग्रह का प्रधान उद्देश्य सैन्य संग्रह है I राजा के कोष में स्वर्ण ,रजत ,रत्न आदि प्रचुर होना चाहिएI  जिसे कि वह संकटों को पार करने में समर्थ हो सके I सोमदेव ने क्षीण हुए कोष की वृद्धि के लिए प्रधान साधन चार कहे हैं I देवधन, द्विजधन, वणिक धन ,और मंत्री ,पुरोहित ,सामंत ,भूमिपति ,से प्राप्त धन I ५

सोमदेव का कथन है कि कोष की वृद्धि के लिए कर लगाना अनिवार्य है I परंतु इस विषय में राज्य को अनेक नियमों का पालन करना चाहिए I समृद्ध प्रजा ही कर देने में समर्थ होती है I प्रजा की समृद्धि हेतु राजा को प्रयत्नशील रहना चाहिए I बाधाओ और कष्टों से पीड़ित प्रजा कर नहीं दे सकती I अतः प्रजा को बधाओ और कष्टों से रहित करके उसपर कर लगाया जाना चाहिए I  कर लगाने में राजा के लिए मर्यादा का पालन करना भी आवश्यक है I कुछ व्यक्ति और संस्थाएं शास्त्रों में कर मुक्त कहें गए हैं उन पर भी कर लगाना अनुचित है I

राजा द्वारा भूमि और ग्रामों का दान दिया जाता था I  परंतु ऐसे ग्रामों को दान नहीं करना चाहिए जो कि राज्य के अन्न का भंडार हो इन्हीं पर सेना की वृद्धि निर्भर होती है I कृषि की रक्षा आवश्यक है इसी पर राजकोष की वृद्धि निर्भर है I अतः कृषि की समृद्धि के साधनों का सिंचाई आदि का राज्य को प्रबंध करना चाहिए I व्यापारियों से क्रय विक्रय व्यापार पर कर देना उचित है I न्याय युक्त कर राज्य को समृद्ध बनता है  I गो मंडल के अंतर्गत सभी प्रकार के पशु आ जाते हैं I उसका कुछ अंश राज्य के कोष में संचित होना चाहिए I सोमदेव ने राजकीय आय  व्यय के विस्तृत विवरण दिए हैं I

दुर्ग-सुरक्षा की दृष्टि से पुरो  और राजधानियों की रचना दुर्गों के रूप में होती थी I दुर्गहीन देश शत्रु द्वारा अवश्यक जीता जाता है I दुर्ग में स्थित होने पर शत्रु के उद्योग निष्फल हो जाते हैं I और आपत्तियों का निराकरण होता है I ६ दुर्ग का विषम स्थान पर होना, विशालता, भोजन ,जल, ईंधन ,आदि का बाधा रहित और सुव्यवस्थित होना ,वीर पुरुषों का उपस्थित रहना ,आदि दुर्ग की संपदाए हैं I ७ दुर्ग में आवागमन पर समुचित नियंत्रण आवश्यक हैI  विजय अभिलाषी शत्रु, साम, दान, भेद ,दंड उपाय ,से दुर्ग को जीत सकते हैं I घेरा डालकर ,खंदको में छिपकर ,छल से या तीक्ष्ण गुप्तचरों की सहायता से, दुर्ग में प्रवेश करने के उपाय किए जा सकते हैं I सोमदेव सूरी ने दुर्ग को दो मुक्त भागों में बाटा हैI आहार्य और स्वाभाविकI  मनुष्य निर्मित दुर्ग आहार्य है ,स्वाभाविक दुर्ग वे है जिनका निर्माण प्रकृति ने स्वयं किया है ,इसके अंतर्गत गिरी दुर्ग ,माहि दुर्ग आदि हैं I

भूभाग- सोमदेव ने विभिन्न प्रकार के विभागों की व्याख्या करके उनके स्वरूप का निर्धारण किया है I कुछ इस प्रकार है राष्ट्र ,देश, विषय, जनपद मंडल, दरत ,निगम,

मंडल सिद्धांत- अपने से प्राचीन राज्यशास्त्रकारों का अनुकरण करते हुए सोमदेव ने भी मंडल सिद्धांत का प्रतिपादन किया है I उसने स्पष्ट रूप से नौ प्रकार के राजाओं के लक्षण दिए हैंI  ८ उदासीन, मध्य ,बीजिगिषु ,अरी ,मित्र, पार्ष्णिग्राह ,आक्रांद्र ,पाष्णिग्राहसार, और आक्रन्दसार I इसमें मित्र राजा चार प्रकार के हैं I सहज मित्र ,कृत्रिम मित्र, प्राकृति मित्र, और नित्य मित्र I

पर राष्ट्र नीति- सोमदेव ने पर राष्ट्र नीति का भी सम्यक विवेचन किया था I उसके कुछ सिद्धांत निम्न है-

१-शत्रु के प्रति व्यवहार-  सोमदेव का मत है कि जो राजा दुष्टकुल दुष्ट हृदय लोभी विरक्त प्रकृति अन्यायी व्यसनी  हो तथा जिसकी प्रकृतियां विरुद्ध हो गए हो उसे पर आक्रमण कर देना चाहिए I दुर्बल आश्रय वाले शत्रु का उच्छेदन सरलता से किया जा सकता हैI  बिजिगीषु राजा अपने शत्रु को विभवहीन करके या उसके भी शत्रु से उसका युद्ध कराकर  उसका उत्पीड़न या कर्षण करें  I९

२- षाड्गुण्यनीति-सोमदेव ने संधि ,विग्रह ,यान ,आसान, द्वैधीभाव , द्वारा अन्य राजाओं के प्रति व्यवहार का वर्णन किया है I विभिन्न परिस्थितियों में उनके प्रयोग को व्यावहारिक रूप से प्रदर्शित किया गया है I १०

३-उपाय-  सोमदेव ने चार उपाय साम, दान,  भेद, और दंड का भी निरूपण किया है I वे प्रयोग के लिए उनके भेद और परिस्थितियों का भी विस्तार से चित्रण करते हैं I ११

४-शक्ति-  राज्य का संचालन करने के लिए सोमदेव तीन शक्तियों का वर्णन करते हैं I बुद्धि, प्रभु ,और उत्साह ,बुद्धि का बल, बुद्धिशक्ति हैI  कोष और सैन्यबल प्रभुशक्ति है और विक्रम उत्साह शक्ति है I १२ इन तीनों शक्तियों से संपन्न राजा विजई होता है I

सेना-  राजा तथा राज्य के कल्याण हेतु सैन्य बल सभी परिस्थितियों में रक्षा के लिए सन्नद्ध रहता है I इस संबंध में निम्न तत्व हैं -

१-सेना के भेद-  कौटिल्य के आधार पर सोमदेव ने सेना के छह भेद कहते हैं -मौल ,भृत्यक ,भृत्य श्रेणी मित्र, और आटविक ,भृत्य सामन्तों की सेना राजा के अधीन भी कार्य करती रहती है I संभवत यही भृत्यबल था I  इन छः सेनाओं में मौलबल सर्वोच्च है I जो आपत्ति में भी स्वामी का परित्याग नहीं करता I कभी द्रोह नहीं करता और शत्रु द्वारा अभेद्ध रहता  है I  १३

२- सेना की विरक्ति-  अनेक कारणों से सेना विरक्ति हो  सकती है I अतः राजा को ऐसे अवसर नहीं आने देना चाहिए I सेना की विरक्ति के पांच कारण हो सकते हैं - सेना का नियमित रूप से निरीक्षण ना होना, सेना का नियमित रूप से पूरा देय वेतन भत्ता आदि का न मिलाना ,वृद्धि में विलंब किया जाना, आपदाओं में सेना की रक्षा न करना ,प्रोत्साहन और सम्मान का न दिया जाना I राजा को चाहिए की सेना की विरक्ति के इन कारणों को उत्पन्न न होने दे I और उत्पन्न हो जाने पर उसका निराकरण करें I

३-सेना का उत्साह-  राजा को चाहिए की सेना को उत्साहित करने का सदा प्रयत्न करें I इसके लिए चार गुण हैI  १४-सेवा में क्षत्रियों का आधिक्य , शास्त्रों के संचालन की योग्यता ,शौर्य ,स्वामी के प्रति अनुरक्ति I

४-सेना के अंग-  प्राचीन आचार्य के समान सोमदेव ने चार प्रमुख अंग कहें हैं I पदाति ,रथारोही ,अश्वारोही ,और गजारोही I  उन्होंने सबके गुणों और विशेषताओं को विस्तार से वर्णन किया है  I१५ परंतु यह वर्णन पारस्परिक ही अधिक है I इस समय तक भारतीय सैनिक पद्धति में रथ सेवा का प्रायः लोप हो चुका था  I

५-सेनापति- सोमदेव ने बलाधिकृत नाम के पदाधिकारी को सेना में महत्वपूर्ण कहा है I संभवत 6 प्रकार की  सभी मौल आदि सेनाओं का प्रधान अधिकारी बलाधिकृत था I गुप्तकालीन अभिलेखों में भी बला धिकृत पद का उल्लेख है I सोमदेव एक से अधिक बलाधिकृत का उल्लेख करते हैंI  वे सेना के संपूर्ण आधिपत्य को एक ही व्यक्ति के अधिकार में देना उचित नहीं समझते I उन्होंने महाबलाधिकृत पद का उल्लेख नहीं किया जो संपूर्ण सेना का सर्वोच्च अधिकारी होता है I सेनापति की योग्यताएं बहुमुखी होनी चाहिए I वह कुलीन संपन्न परिवार का साम आदि उपाय का ज्ञाता , आयुधों और सैन्य  संचालन का अनुभवी प्रज्ञावान ,स्वामी भक्त ,दृढ़ ,आचरण का सत्यवादी पवित्रशील शौर्य संपन्न, पुरस्कृत शत्रुओं से प्रभावित न होने वाला ,और सुगठित दृढ़ शरीर का होना चाहिए I १६ सेनापति को दुर्गुणों और दोषों से मुक्त होना चाहिए  I सोमदेव ने सेनापति के दुर्गुणों का विस्तार से वर्णन किया है  I

युद्ध- सोमदेव ने युद्ध के सैद्धांतिक और क्रियात्मक रूप का वर्णन किया है I उसका मत है की समस्याओं का समाधान युद्ध द्वारा संभव नहीं है और ना ही यह उचित है I बुद्धिसाध्य उपाय के असफल होने पर ही दंड का प्रयोग उचित है I १७ भारतीय राजशास्त्र में युद्ध के संबंध में विशिष्ट नियमों का निर्धारण किया गया है I यह नैतिकता के अनुकूल थे I भयभीत और शास्त्रहीन शत्रु का रणभूम में वध करना उचित नहीं है I १८ युद्ध स्थल में शत्रु पक्ष के योद्धा के पकड़े जाने पर उसको सत्कारपूर्वक मुक्त कर देना उचित है I १९ युद्ध में विजय को तीन प्रकार का कहा गया है -धर्म विजय, लाभ विजय ,और असुर विजय, धर्म विजय राजा वह होता है जो पराजित राजा के विनय भाव से ही संतुष्ट हो जाए तथा पराजित राजा और उसकी प्रजा की रक्षा करें I पराजित राजा के धन को प्राप्त करके जो विजई राजा संतुष्ट हो जाता है वह लोभी विजई होता है I जो विजई राजा पराजित राजा के प्राणों का और उसकी प्रजा के धन मानव प्राणों का अपहरण करता है उसको असुर विजई कहते हैं I २० विजयी राजा के वर्णनों में सोमदेव ने प्राय कौटिल्य का ही अनुसरण किया है I

संदर्भ ग्रंथ

१-नीति वाक्यामृत 28. 22

२-नीति वाक्यामृत 28.22

३-नीति वाक्यामृत 28 *5 * 6

४-नीति वाक्यामृत 28 * 23

५-नीति वाक्यामृत 28.1

६-नीति वाक्यामृत 20.1

७-नीति वाक्यामृत 20.3

८-समृद्धि के द्वारा स्वामी की आपदाओं को दूर करने में समर्थ भूभाग निगम कहलाता है

९-वही 29.32

१०-वही 29.42.49

११-वही 29.69.74

१२-वही 29.36.40

१३-वही 22.15

१४-वही 22.13

१५-वही 22.2.12

१६-वही 12.1

१७-वही 30.5

१८-नीति वाक्यामृत 30.75

१९-वही 30.76

२०-वही 30.70.72

Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.

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