हिंदू राजशास्त्र के अध्ययन का महत्व

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हिंदू राजशास्त्र का महत्व-  भारतीय सभ्यता की तीन मुख्य विशेषताएं हैं आध्यात्मिकता बौद्धिकता एवं जीवन शक्ति I जैसा कि अरविंद घोष ने लिखा है की आध्यात्मिकता भी पृथ्वी पर शून्यता में नहीं फलती फूलती १ I वस्तुत राजनीति और धर्म के अति निकट संबंधों से ओत-प्रोत होते हुए भी प्राचीन भारत के राज धर्मतंत्रात्मक नहीं थे और ना ही मध्ययुगीन यूरोप की भांति प्राचीन भारत में दो सत्ताओं लौकिक और आध्यात्मिक जैसा कोई भेदभाव किया गया तथा ना इस आधार पर कटु एवं भ्रामक संघर्ष ही चला I राजा और राज्य के कल्याणकारी स्वरूप को ही भारतीय विचारों ने सदैव प्रस्तुत किया I यही कहा गया कि राजा को अपने राज्य पर हितकारी कार्यों की वर्षा करनी चाहिए I अपनी प्रजा पर समुचित नियंत्रण रखना चाहिए अपराधियों को दंडित करना चाहिए आदि राज्य संबंधी सिद्धांतों में केंद्रीय स्थान धर्म के लिए इसी दृष्टि से आरक्षित किया गया है कि राज्य लोगों के सर्वांगीण विकास में सहायक हो राज्य को उसी मात्रा तक अच्छा या बुरा माना गया जहां तक वह अपने कल्याणकारी स्वरूप के पालन और अभिवृद्धि में सहायक हो राज्य का ध्येय धर्म की अभिवृद्धि के साथ ही लौकिक सुख और आर्थिक कल्याण की प्राप्ति माना गया २ I

प्राचीन भारतीयों को राजनीति के अनेक सिद्धांतों का ज्ञान था I उस युग के सुदूर अतीत में वेदों में वर्णित राजा उसके निर्वाचन सभा और समिति जैसी लोकप्रिय संस्थाओं राजा की पदच्युति और उसके पुनः राज्यारोहण आदि बातों से वैदिक कालीन राजनीति जागृति का प्रमाण मिलता है I भारतीय विचारों ने राज्य की उत्पत्ति के संबंध में आधुनिक कालीन चारों सिद्धांत दैवी शक्ति अनुबंध और विकास का उल्लेख किया था I हां उन्होंने किसी भी सिद्धांत को विस्तार पूर्वक प्रतिपादित नहीं किया I अधिकांश प्राचीन भारतीय विचारक इस शैली के समर्थक थे कि थोड़े से शब्दों में विस्तृत और अनेकार्थी विचारों को प्रकट कर दिया जाए I उनकी शैली गागर में सागर की थी और यह दुर्भाग्य की बात है कि आधुनिक विद्वानों ने उसे अनेकार्थी शैली के वास्तविक मंतव्य को समझने और उनमें निहित गुढ़ार्थो का विश्लेषण करने की अपेक्षा की I प्राचीन भारतीय विचारों ने पाश्च्यात्य विचारकों के समान ही बल्कि कुछ क्षेत्रों में तो उनसे भी बढ़कर राज्य और शासन की परम आवश्यकता को स्वीकार किया तथा अराजकता के दोषों की ओर ध्यान दिलाया I अति प्राचीन महाकाव्य रामायण और महाभारत में अराजकता की व्यवस्था का जो सुंदर वर्णन किया गया है I वह आश्चर्यचकित करने वाला है राजधर्म का वर्णन करने वाले लगभग सभी ग्रन्थों में यही आग्रह किया गया है कि सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए दुष्टों का दमन और सज्जनों का संरक्षण किया जाना चाहिए पश्चात जगत की तुलना में I प्राचीन भारत में राज्य को अति आवश्यक और उपयोगी संस्था मानते हुए राज्य और शासन संबंधी विचारों का इतने व्यवस्थित और लोको पकारक रूप में प्रसार किया कि पश्चिम की तुलना में इस देश में अराजकतावादी और व्यक्तिवादी विचारधाराएं विकसित नहीं हो पाई  I

वास्तव में कौटिल्य अर्थशास्त्र के विश्लेषण से ही प्राचीन भारतीय राजनीति की महानता प्रकाश में आने लगी और विभिन्न शोधों तथा अध्ययन के बल पर पश्चिम की चकाचौंध से अभिभूत विद्वानों को यह मानने के लिए मजबूर होना पड़ा की प्राचीन भारतीयों ने राजनीति में महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए थे I भारतीयों ने राजनीतिक समस्याओं सैद्धांतिक और व्यावहारिक पक्षों का गहनता से विचार किया था और राज्य के उस कल्याणकारी स्वरूप को बहुत पहले से व्यापक रूप में चित्रित कर दिया था जिनकी कल्पना पश्चात विचारकों ने आधुनिक युग में की है I प्राचीन भारत में राज्यशास्त्र के निष्णात अनेक आचार्य हुए जिनका उल्लेख महाभारत तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मिलता है यथा विशालाक्ष इंद्र बृहस्पति शुक्र मनु भारद्वाज पाराशर वातव्याधि कात्यायन आदि कौटिल्य काल से पूर्व ही राजशास्त्र को अर्थशास्त्र से पृथक कर दिया गया था और उसे वैज्ञानिक आधार पर विकसित भी कर दिया गया था  I शुक्राचार्य के अनुयायियों ने तो यहां तक घोषित किया की राजनीति ही केवल एक विज्ञान था और अन्य सभी विज्ञानों की उत्पत्ति तथा अंत उसी में थे I अब इस बात में कोई संदेह नहीं रह गया है कि कौटिल्य के पूर्व कालीन परंपरा के अनुसार राज्यशास्त्र का पद स्वतंत्र विज्ञान के रूप में त्रयी वेद विद्या और आन्वीक्षिकी  के रूप में था ३  I कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में राजनीति का विवेचन लौकिक दृष्टि से और स्वतंत्र विज्ञान के रूप में किया है और यह कहा है कि संसार की उन्नति का मार्ग दंड नीति पर निर्भर करता है I

विधि की संकल्पना-  विधि की संकल्पना उन कसौटियों में से एक है जो राजनीति के धर्मनिरपेक्ष एवं लौकिक स्वरूप को बताती है I अनेक लेखकों का मत है कि हिंदू लेखक विध्यात्मक कानून से परिचित न थे विध्यात्मक कानून वह होता है I  जिसे प्रभुत्वपूर्ण राजनितिक अधिकारी निर्माता एवं लागू करते हैं I शुक्र एक स्थान पर कहता है कि निम्नलिखित कानून को सदैव राजा को ही प्रत्यापित करनी चाहिए I नापतोल एवं सिक्कों के बारे में किसी भी प्रकार के मिथ्या व्यवहार की आज्ञा नहीं होनी चाहिए I घूस स्वीकार नहीं करनी चाहिए चोरों को संरक्षण प्रदान नहीं करना चाहिए तालाबों और उद्यानों में बाधा नहीं डालनी है I यद्यपि शांति पर्व में इतनी अस्पष्टता का अभाव है फिर भी व्यवहार या विधि के तीन प्रकार बताए गए हैं I जिनमें से एक का संबंध अभियोगों से उत्पन्न व्यवहार से है कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में कानून के चार प्रकार बताएं हैं  I धर्म व्यवहार चरित्र या प्रथा और राज्य प्रशासन ४ I

राजत्व की उत्पत्ति-  राजत्व की उत्पत्ति से संबंधित कुछ सिद्धांतों ने राजनीतिक चिंतन के लौकिक पक्ष पर बल दिया है I वैदिक राजा मानव थे और इसलिए उन्हें पदच्युत् एवं निष्कासित किया जा सकता था I वैदिक काल में राजाओं का किसी रूप में वरण किया जाता है  I निसंदेह रामायण और महाभारत में भिन्न सिद्धांतों का भी उल्लेख है किंतु हम इस बात को नहीं भूल सकते कि दोनों ही महाकाव्य में अत्याचारी शासको और अच्छे राजाओं के बीच स्पष्ट अंतर किया गया है I अतः इस प्रश्न पर हम चाहे विधाओं के वर्गीकरण पौरुष का सिद्धांत या कानून की संकल्पना या राजत्व के सिद्धांत की दृष्टि से विचार करें I  यह स्पष्ट है कि हिंदू राजनीति चिंतक धर्म शास्त्रीय नहीं है वरन् धर्मनिरपेक्ष एवं लौकिक हैI  हमारे विचार में यह मध्य युगीन पश्चात राजनीतिक चिंतन से भिन्न है जो प्रधानतः धर्मशास्त्री है ५  I

अब यह तथ्य  छिपा नहीं है कि प्राचीन भारत में राजनीतिक विचारों और संस्थाओं का उदय तथा विकास विश्व के अन्य किसी भी देश की अपेक्षा बहुत पहले हो चुका था I मुस्लिम शासनकाल से पूर्व तक हिंदू राजनीतिक विचारों और संस्थाओं का विकास होता रहा था I बाद में भी यह विचार और संस्थाएं किसी न किसी रूप में अंग्रेजी हुकूमत के समय भी बनी रही आज के युग में पश्चात विज्ञान और तकनीकी विकास के फल स्वरूप तथा सुदीर्घ क़ालीन विदेशी हुकूमत के प्रभाव से भारत में उसकी प्राचीन राजनीतिक संस्थाओं को पुनः अपनाना व्यावहारिक नहीं रहा है तथा इस बात से इनका नहीं किया जा सकता है कि संसार के अन्य किसी देश की तुलना में भारतीय राजनीति और शासन पद्धति का जीवनकाल 30000 वर्ष से भी अधिक लंबा रहा है I हमें प्राचीन भारतीय राजनीतिक विचारों और संस्थाओं का गहराई से अध्ययन करना चाहिए ताकि हम उनका उचित मूल्यांकन कर सकें और विदेशियों द्वारा फैलाई गई भ्रांत धारणाओं का निराकरण करके भारत की अतीत की महानता को पुनर्जीवित करने के कार्य को आगे बढ़ा सकें I प्राचीन भारतीय राजनीतिक विचारों ने ईश्वर ब्रह्मा आत्मा कर्म इतिहास की प्रकृति आदि तत्व शास्त्रीय धारणाओं की व्याख्या करके जो सामाजिक राजनीतिक प्रस्थापनाएं की हैं उन्हें समझाने के लिए पहल करनी होगी  I

निष्कर्ष- हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि हिंदू राजनीति का अध्ययन भारतीयों में आत्मविश्वास का सृजन करते हैं I डॉक्टर भंडारकर ने ठीक ही लिखा है कि किसी भी भारतीय को उस समय तक शिक्षित नहीं कहा जा सकता जब तक कि वह अपने देश के इतिहास के संबंध में कुछ ना जाने उसे अपने बौद्धिक एवं आध्यात्मिक प्राचीनता का ज्ञान ना हो I सदियों की परतंत्रता के बाद हम भारतीयों का यह दायित्व है कि हम अपने देश का अपनी उपलब्ध विरासत के अनुसार पुनर्निर्माण करें और जब तक हमें अतीत की परंपराओं का समुचित ज्ञान नहीं होगा तब तक ना तो हम भविष्य के संबंध में उपयोगी योजनाएं बना सकेंगे और ना ही वर्तमान को समझ सकेंगे तथा पश्चात विचारको के मनगढ़ंत तथ्यों का सटीक जवाब दे सकेंगे I

संदर्भ ग्रंथ- 

१- यू एन घोषाल ए हिस्ट्री ऑफ इंडियन पॉलीटिकल आईडियाज पेज 9

२-डॉ परमात्मा शरण प्राचीन भारत में राजनीतिक विचार एवं संस्थाएं पृष्ठ 15 -16

३-उपरोक्त पृष्ठ 14

४-उपरोक्त पृष्ठ 15

५-डॉ परमात्मा शरण प्राचीन भारत में राजनीतिक विचार एवं संस्थाएं पृष्ठ 17

Authored by Dr. Viplav, Professor, ChandraKanth Mahavidlaya, Secendrabad, Uttar Pradesh.

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